देश भक्ति
अरुण दिव्यांशस्वदेश है विदेश नहीं ,
विशेष है अवशेष नहीं ,
है प्यार यहाॅं द्वेष नहीं ,
बंधुत्व है आवेश नहीं ।
भारत माता है ज्ञाता ,
माॅं बेटे है रिश्ता नाता ,
विश्व इसको है ध्याता ,
गुरु गौरव श्रेय बढ़ाता ।
भारत कभी भार नहीं ,
क्रोध का इजहार नहीं ,
भारत मानता हार नहीं ,
किससे इसे प्यार नहीं ।
भारत माता स्वयं गंगा ,
नहीं कभी यहाॅं पे दंगा ,
सबसे बढ़ाता प्रेम हस्त ,
नहीं चाहता लेना पंगा ।
विश्वविख्यात यहाॅं पान ,
यहाॅं का बासमती धान ,
सुसंस्कार मान सम्मान ,
इससे भारत बने महान ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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