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सनातन संस्कृति में चैत्र पूर्णिमा, ज्ञान और भक्ति का संगम है - वेदों के ज्ञाता थे हनुमान जी

सनातन संस्कृति में चैत्र पूर्णिमा, ज्ञान और भक्ति का संगम है - वेदों के ज्ञाता थे हनुमान जी

दिव्य रश्मि के उपसंपादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से।
सनातन संस्कृति में प्रत्येक तिथि का अपना विशिष्ट महत्व है, परंतु पूर्णिमा तिथि को विशेष रूप से पवित्र और ऊर्जावान माना गया है। इस दिन चंद्रमा अपनी सोलहों कलाओं के साथ पूर्ण रूप में आकाश में विद्यमान होता है। चंद्रमा की यह पूर्णता केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक प्रतीक भी है, पूर्णता, शांति, सौम्यता और चेतना का। चैत्र पूर्णिमा वर्ष की पहली पूर्णिमा होती है, जो नवसंवत्सर के आरंभ के बाद आती है। यह समय वसंत ऋतु का होता है, जिसे ‘ऋतुराज’ कहा गया है। इस काल में प्रकृति नवजीवन से भर उठती है। वृक्षों पर नई कोंपलें, वातावरण में मधुरता और जीवन में नवीन ऊर्जा का संचार होता है। इसी दिव्य तिथि पर अनेक स्थानों पर हनुमान जी की जयंती मनाई जाती है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति, ज्ञान और समर्पण का पर्व है।


अधिकांश लोग हनुमान जी को केवल बल, वीरता और सेवा के प्रतीक के रूप में जानते हैं। परंतु उनका एक और अत्यंत महत्वपूर्ण स्वरूप है, वह है ज्ञान का। वाल्मीकि रामायण और अन्य ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि हनुमान जी केवल बलशाली ही नहीं, बल्कि अत्यंत विद्वान, वाक्पटु और वेदों के ज्ञाता थे। उनके भीतर भक्ति और ज्ञान का ऐसा संतुलन था, जो उन्हें अन्य सभी पात्रों से अलग करता है। उनकी वाणी में इतनी मधुरता और गहराई थी कि जब उन्होंने पहली बार भगवान राम से संवाद किया, तो राम तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण वानर नहीं है, बल्कि अत्यंत विद्वान और योग्य व्यक्तित्व है।


भगवान राम और हनुमान जी की पहली भेंट ऋष्यमूक पर्वत पर हुई थी। जब हनुमान जी ब्राह्मण वेश में राम और लक्ष्मण के पास पहुंचे और उनसे संवाद किया, तो उनकी भाषा, उच्चारण, व्याकरण और भावों की स्पष्टता को देखकर राम अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने लक्ष्मण से कहा कि “हनुमान की वाणी से स्पष्ट होता है कि ये चारों वेदों के ज्ञाता हैं, इन्होंने व्याकरण का गहन अध्ययन किया है और इनकी वाणी में कोई त्रुटि नहीं है।” यह कथन केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि उस ज्ञान की पहचान थी, जो हनुमान जी के भीतर निहित था।


सनातन धर्म के मूल आधार चार वेद हैं, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इन वेदों का ज्ञान प्राप्त करना अत्यंत कठिन और गहन साधना का परिणाम होता है। हनुमान जी को इन चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान था। वे केवल वेदों को जानते ही नहीं थे, बल्कि उनके अर्थ, भाव और प्रयोग को भी भली-भांति समझते थे। उनकी वाणी में वेदों की गूंज थी, उनके कर्मों में धर्म का पालन था और उनके विचारों में ज्ञान का प्रकाश।


हनुमान जी केवल वेदों के ज्ञाता ही नहीं थे, बल्कि संस्कृत भाषा और व्याकरण में भी पारंगत थे। यह बात रामायण के प्रसंगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। संस्कृत व्याकरण अत्यंत जटिल और सूक्ष्म विषय है। इसमें शब्दों का सही प्रयोग, उच्चारण, लय और अर्थ का विशेष महत्व होता है। हनुमान जी की वाणी में यह सभी गुण स्वाभाविक रूप से विद्यमान थे। इससे यह सिद्ध होता है कि उन्होंने न केवल वेदों का अध्ययन किया था, बल्कि उन्होंने शिक्षा के सभी आयामों में महारत हासिल की थी।


रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन करने वाला ग्रंथ है। इसमें हनुमान जी को केवल एक सेवक के रूप में नहीं, बल्कि एक ज्ञानी, विवेकशील और आदर्श भक्त के रूप में प्रस्तुत किया गया है। तुलसीदास जी ने हनुमान जी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। केवल भक्ति भी पर्याप्त नहीं है। बल्कि ज्ञान और भक्ति का संतुलन ही जीवन को सफल बनाता है।


रावण भी अत्यंत विद्वान था। वह भी वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता था। परंतु उसके ज्ञान का प्रयोग अहंकार, शक्ति और अधर्म के लिए हुआ। इसके विपरीत, हनुमान जी ने अपने ज्ञान का उपयोग धर्म, सेवा और समर्पण के लिए किया। हनुमान जी द्वारा लंका दहन केवल एक शक्ति प्रदर्शन नहीं था। यह प्रतीक था अहंकार के अंत का। अधर्म के विनाश का। ज्ञान के प्रकाश का। जब उन्होंने लंका को जलाया, तो वह केवल एक नगर नहीं, बल्कि रावण के अहंकार, द्वेष और अज्ञान को समाप्त करने का प्रयास था।


चैत्र पूर्णिमा के दिन हनुमान जयंती मनाने का विशेष महत्व है। इस दिन हनुमान जी की पूजा से शक्ति और साहस प्राप्त होता है। संकटों से मुक्ति मिलती है। ज्ञान और विवेक का विकास होता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से भी हनुमान जी प्रसन्न होते हैं।


आज के युग में जहां भौतिकता और प्रतिस्पर्धा का बोलबाला है, वहां हनुमान जी का जीवन कई महत्वपूर्ण सीख देता है ज्ञान के साथ विनम्रता, शक्ति के साथ सेवा और सफलता के साथ समर्पण। वे सिखाते हैं कि सच्चा बल केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन और बुद्धि का भी होता है।


हनुमान जी केवल एक देवता नहीं है, बल्कि एक आदर्श हैं- ज्ञान, भक्ति और कर्म के। चैत्र पूर्णिमा का यह पावन अवसर यह याद दिलाता है कि ज्ञान का उपयोग सदैव सकारात्मक दिशा में होना चाहिए। भक्ति में अहंकार नहीं, समर्पण होना चाहिए और जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं का नहीं, बल्कि समाज का कल्याण भी होना चाहिए। हनुमान जी का जीवन यह सिखाता है कि जब ज्ञान और भक्ति का संगम होता है, तभी सच्चे अर्थों में जीवन सफल होता है। -------------
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