मगध के विस्मृत दुर्ग: गढ में शौर्य गाथा
सत्येंद्र कुमार पाठक
मिट्टी की परतें और इतिहास की गूँज में मगध की धरती केवल मौर्यों और गुप्तों के साम्राज्यों की राजधानी भर नहीं रही है, बल्कि यहाँ का हर गाँव अपने आप में एक 'गणतंत्र' और 'दुर्ग' रहा है। जहानाबाद, अरवल, गया, औरंगाबाद और रोहतास के विस्तृत मैदानी इलाकों में आज भी जो ऊंचे 'डीह' (मिट्टी के टीले) और 'गढ़' दिखाई देते हैं, वे केवल खंडहर नहीं हैं। वे हमारे पुरखों के हस्ताक्षर हैं, जो सदियों की धूल फांकने के बाद भी अपनी अस्मिता को जीवित रखे हुए हैं। आज जब हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों को भूल रहे हैं, तब लारी, धरौत, घेजन और टिकारी जैसे गढ़ों से प्राप्त शिलालेख हमें पुकार रहे हैं। ये शिलालेख और यहाँ की मूर्तियाँ हमें उन वीर पुरुषों और सती महिलाओं की याद दिलाती हैं, जिन्होंने अपनी माटी की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी।
गढ़ और डीह: मगध की सुरक्षात्मक वास्तुकला - मगध के गढ़ों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि ये 'रक्षक गाँवों' (Fortified Villages) की श्रेणी में आते थे। धराउत गढ़ (जहानाबाद): बराबर की पहाड़ियों के साये में बसा यह गढ़ प्राचीन 'गुणावन्त' का केंद्र था। यहाँ के शिलालेखों और ऊंचे टीलों से स्पष्ट होता है कि यह एक सामरिक छावनी थी। लारी गढ़ अरबल क्षेत्र प्राचीन काल से ही 'वीरता' के लिए प्रसिद्ध रहा है। 'लारी' का टीला उत्तर-गुप्त कालीन बसावट का साक्ष्य है। घेजन और बेला गढ़: ये स्थल न केवल सैन्य शक्ति के केंद्र थे, बल्कि पाल कालीन मूर्तिकला और तांत्रिक साधना के भी गढ़ थे।
शिलालेखों की मूक भाषा: ब्राह्मी से कुटिल तक का सफर -इन गढ़ों से प्राप्त शिलालेख इतिहास की कड़ियों को जोड़ते हैं। एक शोधकर्ता के रूप में जब हम इन पत्थरों को पढ़ते हैं, तो इतिहास की परतें खुलने लगती हैं: कुटिल लिपि का वैभव: धरौत और घेजन से प्राप्त पाल कालीन शिलालेखों में 'कुटिल लिपि' का प्रयोग हुआ है। ये ८वीं से १०वीं शताब्दी के हैं। इनमें भगवान शिव की स्तुति के साथ-साथ स्थानीय शासकों के नामों का उल्लेख है, जो उस समय के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को स्पष्ट करते हैं। उत्तर-गुप्त कालीन साक्ष्य: लारी गढ़ की ईंटों और स्तंभों पर अंकित छोटे-छोटे 'नाम-लेख' (Label Inscriptions) उस समय की स्थानीय स्वायत्तता को दर्शाते हैं। मध्यकालीन देवनागरी: उमगा (औरंगाबाद) और दावथु गढ़ के शिलालेख १५वीं शताब्दी के राजाओं (जैसे राजा भैरवेंद्र) के शौर्य को प्रमाणित करते हैं। . जातिगत गौरव और वंशावली की जड़ें - मगध की जातियों का इतिहास इन गढ़ों और 'निकास' (Origin points) से अभिन्न रूप से जुड़ा है। हर जाति के अपने 'कुल पुरुष' और 'आराध्य' हैं, जिनका केंद्र ये गढ़ ही रहे हैं: ब्राह्मण और भूमिहार (बाभन): मगध के अधिकांश गढ़ों (जैसे टिकारी, लारी, धरौत) में भूमिहार ब्राह्मणों का ऐतिहासिक वर्चस्व रहा है। यहाँ के 'ब्रह्म स्थान' उन विद्वान पूर्वजों की स्मृति हैं जिन्होंने शस्त्र और शास्त्र दोनों को थामा।
क्षत्रिय (राजपूत): औरंगाबाद और भोजपुर के गढ़ों में 'सूर्यवंशी' और 'चंद्रवंशी' राजाओं के शौर्य की गाथाएँ आज भी भाट सुनाते हैं। कुंवर सिंह जैसे महापुरुषों की जड़ें इन्हीं गढ़ों के स्वाभिमान में छिपी हैं।
यादव और कृषक समुदाय: 'बाबा करियात' और 'वीर कुआर' जैसे लोक देवताओं की पूजा मगध के हर डीह पर होती है। ये उन वीरों के प्रतीक हैं जिन्होंने पशुधन और फसलों की रक्षा के लिए अपनी आहुति दी।
दलित और वंचित समाज: 'बाबा चौहरमल', 'राजा सलहेस' और 'दीना-भदरी' जैसे वीरों की गाथाएँ इन गढ़ों के सामंती अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और स्वाभिमान की ऐतिहासिक गवाह हैं।
. सती और शक्ति: महिला शक्ति का ऐतिहासिक योगदान - इन गढ़ों का इतिहास अधूरा है अगर हम वहां की 'सती माई' की चर्चा न करें। मगध के हर गढ़ के प्रवेश द्वार पर एक 'सती स्थान' होता है। ये वे महान महिलाएँ थीं जिन्होंने:आक्रमणकारियों के समय जौहर या आत्मोत्सर्ग किया। परिवार के सम्मान और धर्म की रक्षा के लिए आजीवन तपस्या की थी आज ये 'सती स्थान' कुल देवी के रूप में पूजे जाते हैं, जो नारी शक्ति के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हैं । मगध के गढ़ और डीह केवल मिट्टी के ढेर नहीं, बल्कि हमारी 'सामूहिक स्मृति' के भंडार हैं। शिलालेखों में अंकित एक-एक अक्षर हमें बताता है कि हम कौन थे। लारी का 'लारिया बाबा' हो या धरौत का 'सिद्धेश्वर', ये सब हमारे गौरवशाली अतीत के प्रहरी हैं। यदि आज हमने इन शिलालेखों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढियां अपनी वंशावली और जड़ों को कभी नहीं खोज पाएंगी। इतिहास का संरक्षण केवल सरकार का काम नहीं, बल्कि उस माटी की संतान होने के नाते हमारा भी नैतिक कर्तव्य है। मगध की इन गुमनाम विरासतों को पहचानें। अपने गाँव के 'डीह', अपने कुल के 'देव' और अपने गढ़ के 'इतिहास' को लिपिबद्ध करें। 'निर्माण भारती' का यह शोध-अंक इसी दिशा में एक छोटा सा लेकिन ऐतिहासिक कदम है।
संदर्भ - कनिंघम, अलेक्जेंडर - 'आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट्स' (मगध खंड) ,बुकानन, फ्रांसिस - 'एन अकाउंट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ बिहार एंड पटना' ,स्थानीय वंशावली पोथियाँ (गया पंडा रिकॉर्ड्स) ,मगध की लोकगाथा।
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