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"पथ के भीतर पथ"

"पथ के भीतर पथ"

पंकज शर्मा
रास्ता बाहर नहीं—
वह भीतर भी उतना ही जर्जर है,
जहाँ स्मृतियों की धूल
पाँवों से पहले मन को ढँक लेती है।
मैंने देखा है—
चलना केवल चलना नहीं,
अपने ही संशयों के आर-पार जाना है।


डर की एक महीन परत
त्वचा के नीचे सरकती रहती है,
जैसे कोई अनकहा प्रश्न।
तुम उसे पहचानो,
पर उसके अधीन मत हो—
क्योंकि भय का स्वभाव है
स्वयं को अनिवार्य सिद्ध करना।


कदम—
वे केवल दूरी नापने के उपकरण नहीं,
वे संकल्प की भाषा हैं।
धीरे चलना
कभी-कभी सबसे तीव्र प्रतिरोध होता है
उस हड़बड़ी के विरुद्ध
जो तुम्हें स्वयं से दूर करती है।


चोट—
वह केवल देह पर नहीं लगती,
वह दृष्टि को भी बदल देती है।
जहाँ पहले सरलता थी,
वहाँ अब एक प्रश्नचिह्न उग आता है।
पर प्रश्न ही तो वह द्वार है
जिससे होकर अर्थ भीतर आता है।


ज़ख्म—
वे स्मृतियों के बीज हैं,
जो समय की मिट्टी में
अनायास अंकुरित हो उठते हैं।
तुम उनसे भागोगे
तो वे पीछा करेंगे,
तुम उन्हें स्वीकारोगे
तो वे तुम्हारा विस्तार बनेंगे।


वहम—
वह एक अदृश्य जाल है,
जिसमें फँसकर मन
अपनी ही छाया से डरने लगता है।
तुम्हें उसे तोड़ना होगा—
तर्क से नहीं,
अपनी अनुभूति की सच्चाई से।


आहिस्ता—
यह केवल गति नहीं,
एक दृष्टिकोण है।
यह वह विराम है
जिसमें तुम अपने भीतर की धड़कन सुनते हो,
और जान पाते हो
कि यात्रा का अर्थ गंतव्य से भिन्न है।


अंततः—
पथ तुम्हें कहीं ले जाने के लिए नहीं,
तुम्हें तुम्हारे भीतर लौटाने के लिए है।
जो जर्जर दिखता है,
वही सबसे प्रामाणिक हो सकता है—
क्योंकि उसी पर चलकर
तुम अपने होने की ध्वनि पहचानते हो।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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