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"मौन की गहराइयों में"

"मौन की गहराइयों में"

पंकज शर्मा
रिश्ते
कभी-कभी शब्दों से नहीं,
मौन की नमी से पहचाने जाते हैं।
जहाँ दिखावे की रोशनी नहीं,
बस एक धीमी-सी ऊष्मा होती है—
जो भीतर
चुपचाप जलती रहती है।


बहुत शोर में
संबंध अक्सर अपना स्वर खो देते हैं।
आवाज़ें ऊँची होती जाती हैं,
पर अर्थ
धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है।
और तब
निकटता भी
दूरी की तरह लगने लगती है।


सच्चा संबंध
किसी घोषणा की तरह नहीं आता।
वह तो
धीरे-धीरे
मन की परतों में उतरता है—
जैसे शांत जल में
चाँद का प्रतिबिंब।


जहाँ शब्द कम होते हैं
वहीं भाव
अपनी असली भाषा में बोलते हैं।
एक दृष्टि,
एक हल्की-सी मुस्कान,
कभी एक मौन उपस्थिति—
इतना ही पर्याप्त होता है।


रिश्तों की गहराई
प्रदर्शन से नहीं मापी जाती।
वह तो
समय के साथ
विश्वास की तरह जमती है—
धीरे,
पर स्थायी।


शायद इसलिए
मन उन संबंधों को चुनता है
जहाँ शांति अधिक है,
और शब्दों से परे
एक अनकहा अपनापन।
वहीं
रिश्ते
सबसे सच्चे होकर जीते हैं।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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