खामेनेई का अंत और इतिहास की परिक्रमा
डॉ राकेश कुमार आर्य
अमेरिका और इजरायल ने अपनी संयुक्त रणनीति के अंतर्गत काम करते हुए ईरान के राष्ट्रपति खामेनेई का अंत कर दिया है। अमेरिका ने एक बार फिर दिखाया है कि वह अपने शत्रु का अंत करके ही रुकता है। अबसे पहले उसने ओसामा बिन लादेन, कर्नल गद्दाफी जैसे एक नहीं अनेक तानाशाहों या आतंकियों को ठिकाने लगाकर ही दम लिया है। खामेनेई इस समय अमेरिका और इजरायल के निशाने पर था। इसराइल ने भी अपने राष्ट्रीय पराक्रम का परिचय दिया है और संसार के लिए नया संदेश दिया है कि शत्रु चाहे कितना ही बड़ा हो, यदि आपके हौसले बुलंद हैं तो शत्रु का मिटना निश्चित है।
तनिक याद कीजिए 1979 से 1989 के बीच का वह दौर, जब ईरान पर आयतुल्लाह खुमैनी का शासन हुआ करता था। उस दौर में वहां पर शासन के द्वारा ही हजारों लोगों की हत्या की गई थी। अभी जनवरी 2026 में भी वहां पर हजारों की संख्या में उन लोगों की हत्या कर दी गई जो खामेनेई शासन का विरोध कर रहे थे। इस प्रकार आयतुल्लाह खुमैनी और उनके उत्तराधिकारी के द्वारा बड़ी संख्या में अपने ही देश के लोगों का नरसंहार किया गया। इस प्रकार के नरसंहार पर भारत का कोई भी राजनीतिक दल, मुस्लिम संगठन या कोई भी राजनीतिक नेता कुछ भी नहीं कह रहा है। लगता है यह सब कुछ वैधानिक ढंग से हुआ और जिन लोगों की हत्याएं आयतुल्लाह परिवार के शासनकाल में की गईं, वे सचमुच अपराधी थे ?
अपने मूल विषय पर आने से पहले हम यह भी कहना चाहते हैं कि क्या यहूदियों , पारसियों या किसी भी अन्य मजहब के व्यक्ति को किसी मुस्लिम देश में रहने का अधिकार नहीं है ? क्या उन्हें इस धरती पर भी रहने का अधिकार नहीं है ? यदि है तो हमारी सोच में दोगलापन क्यों है कि हमें एक की हत्या पर आंसू बहाते हैं और दूसरे की हजारों हत्याओं को भी हम मानवता के हित में किया गया पुण्य कार्य मान लेते हैं ? यहूदी लोगों ने अपनी जान हथेली पर रखकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ी है। आज भी लड़ रहे हैं और उनके पराक्रमी स्वभाव को देखकर यह भी कहा जा सकता है कि वह भविष्य में भी तब तक लड़ते रहेंगे, जब तक वह अपना अस्तित्व सुरक्षित नहीं कर लेंगे या किन्हीं शक्तियों के द्वारा उनका अस्तित्व पूर्णतया मिटा नहीं दिया जाएगा । क्या अस्तित्व के लिए लड़ना भी पाप है या उनका अल्पसंख्यक होना केवल उन्हें मृत्यु का अधिकारी बना देता है ?
जो लोग इस प्रकार की सोच से ग्रसित हैं कि यहूदियों के लिए केवल मौत ही एकमात्र ईलाज है, वह मानवता के शत्रु हैं और जो लोग इन मानवता के शत्रुओं का मौन रहकर या स्पष्ट शब्दों में समर्थन करते हैं वह और भी बड़े अपराधी हैं।
आज जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला , वहां की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती सहित कुछ दूसरे मुस्लिम संगठन ,राजनीतिक दलों के नेता और कुछ दूसरे सेक्युलरिस्ट जिस प्रकार ईरान के राष्ट्रपति खामेनेई की हत्या पर छाती पीट रहे हैं या कठोर टिप्पणी देकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं और कह रहे हैं कि यह नाइंसाफी है, उन्हें ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के पापों को देखना चाहिए। उसके परिवार के द्वारा किए गए अपराधों को देखना चाहिए ,उसके शासन में मानवता के विरुद्ध हुए अपराधों की जांच पड़ताल करनी चाहिए। इजरायल ईरान के इस युद्ध में यह देखना चाहिए कि मानवता के विरुद्ध अपराध कौन कर रहा है ? अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाला इसराइल या दूसरे के अस्तित्व को मिटाने के लिए कृतसंकल्प ईरान ?
किसी भी देश को और संसार को सांप्रदायिक मान्यताओं के आधार पर हांका नहीं जा सकता । यदि सांप्रदायिक मान्यताओं के आधार पर संसार को हांकने का प्रयास किया गया तो जंगलराज आना स्वाभाविक है । वैसे हमें इस प्रकार के जंगलराज के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जहां-जहां सांप्रदायिकता अपना नंगा नाच दिखा रही है, वहां-वहां पर जंगलराज स्थापित हो चुका है। जितने भर भी युद्ध हो रहे हैं वह सभी सांप्रदायिक शक्तियों के द्वारा लड़े जा रहे हैं। यहां तक कि शासन में बैठे लोगों को भी हमें निष्पक्ष शासक वर्ग नहीं समझना चाहिए। उनकी सोच भी उस समय सांप्रदायिक हो जाती है. जब वह अपने देश की जनता की सांप्रदायिक भावनाओं के अनुरूप दूसरे देशों को डराते धमकाते हैं या किसी दूसरे मजहब के लोगों के अस्तित्व को मिटाने के लिए अपना खुला या मौन समर्थन देते हैं। शासन में बैठे लोगों का राजधर्म यह नहीं होता कि वह जनता की सांप्रदायिक भावनाओं के अनुसार चलें। इसके विपरीत उनका राजधर्म होता है कि वह अपने देश की जनता को संस्कारवान और चरित्रवान बनाएं। संसार भर में दूसरे मजहबों के लोगों को भी जीने का अधिकार देने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें। इस दिशा में कदम उठाते हुए ईरान के अयातुल्लाह खुमैनी परिवार ने क्या अपने देश में कोई भी ऐसी यूनिवर्सिटी स्थापित की, जिसमें चरित्रवान, ज्ञानवान और संस्कारवान समाज बनाने पर बल दिया जाए ? लोगों को दूसरे लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए ? दूसरों के जीवन का सम्मान करने की शिक्षा दी जाए ? और संसार को स्वर्ग बनाने के लिए एक वृहद योजना पर काम किया जाए ? यदि इस दिशा में एक भी काम नहीं किया गया है तो फिर ऐसे किसी भी तानाशाह का मर जाना ही अच्छा होता है जो लोगों को खूनी जंग में भेजने के अतिरिक्त कुछ दूसरा काम ही न कर पाए।
जो राजा जनता के अधिकारों पर हावी होकर शासन करता हो अर्थात रक्तपात में विश्वास करता हो, वह राजा नहीं होता।
जितनी सांप्रदायिक शक्तियां अर्थात देश की सेना और देश के शासनाध्यक्ष या राष्ट्राध्यक्ष इस प्रकार की लड़ाई को अपना समर्थन दे रहे हैं, उन सबके बारे में समझ लेना चाहिए कि वे सभी के सभी आतंकवादी हैं। जो मजहबी मान्यताओं से संसार को हांकने का उपक्रम कर रहे हैं , उनका यह उपक्रम संसार को मिटाने के लिए किया जाने वाला कार्य समझा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि आतंकवाद की कमर टूटनी ही चाहिए।
भारत में जो लोग ईरान के राष्ट्रपति की हत्या पर छाती पीट रहे हैं उन्हें ईरान के शहरों में हो रहे उन प्रदर्शनों की ओर भी ध्यान देना चाहिए जिनमें सम्मिलित लोग अपने राष्ट्रपति की हत्या के उपरांत उत्सव मना रहे हैं। कॉलेजों में पढ़ रही लड़कियों ने अपने हिजाब फेंक दिए हैं और वह अब अपने आप को आजाद अनुभव कर रही हैं। इधर भारत में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत पर कहा है, "हमें यह भी पक्का करना चाहिए कि जम्मू और कश्मीर में जो लोग शोक मना रहे हैं, उन्हें शांति से शोक मनाने दिया जाए. पुलिस और प्रशासन को बहुत संयम बरतना चाहिए और बल या रोक लगाने वाले तरीकों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। "
इन्हीं उमर अब्दुल्ला ने अपने ही प्रदेश से जबरन निकाले गए उन लाखों हिंदुओं के बारे में कुछ नहीं कहा है जो आज देश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और जिन्हें उनके ही पिता के शासनकाल में जम्मू कश्मीर से निकाल दिया गया था। इन्हें यहूदियों के मारे जाने पर भी कोई शिकायत नहीं है, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मारे गए लाखों करोड़ों हिंदुओं का दर्द भी इन्हें दर्द दिखाई नहीं देता। जब शासन में बैठे लोग भी हर चीज को सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखने लगते हैं तो जनसाधारण की जिंदगी बहुत सस्ती हो जाती है। उनका खून भी पानी के भाव सड़क पर बहने के लिए विवश हो जाता है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में मारे गए लाखों करोड़ों हिंदुओं की हत्या पर या उनके साथ की ज्यादतियों पर यदि भारत के मुस्लिम संगठनों, नेताओं से कुछ बोलने के लिए कहा जाता है तो कह देते हैं कि यह उन देशों का अंदरूनी मामला है। इस पर हम कुछ नहीं बोलेंगे और जब ईरान का राष्ट्रपति मारा जाता है तो भारत में प्रदर्शन करने के लिए इसे एक अच्छा हथियार बनाया जाता है। तब कहा जाता है कि यह इंसानियत का मामला है, यानी हिंदू का मामला इंसानियत का मामला नहीं है, मुसलमान का मामला इंसानियत का मामला है।
पीडीपी नेता और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने ईरान के राष्ट्रपति की मृत्यु पर कहती हैं, "आज इतिहास में एक बहुत ही दुखद और शर्मनाक मोड़ आया है, जब इसराइल और अमेरिका ईरान के प्रिय नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या पर शेखी बघार रहे हैं।"
उनका कहना है, "इससे भी ज़्यादा शर्मनाक और चौंकाने वाली बात यह है कि मुस्लिम देशों ने खुले तौर या ख़ामोशी से इसका समर्थन किया, जिन्होंने ज़मीर के बजाय सुविधा और फ़ायदे को चुना। इतिहास इस बात का सबूत होगा कि किसने न्याय के लिए लड़ाई लड़ी और किसने ज़ालिमों की मदद की।"
ध्यान रहे कि महबूबा मुफ्ती ने भी आज तक जम्मू कश्मीर से निकाले गए लाखों हिंदू पंडितों के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए एक शब्द भी नहीं कहा है। जिनकी सोच में मजहब रहता है, जिनके कार्य में मजहब रहता है, जिनकी नीतियों में मजहब रहता है, उनसे आप इस प्रकार की सांप्रदायिक सोच के अतिरिक्त दूसरी बातों की अपेक्षा भी नहीं कर सकते।
वास्तव में जिन लोगों ने पिछली कई शताब्दियों में दूसरे मजहबों के लोगों पर अत्याचार किए हैं,उनके घरों में आज भी शांति नहीं है। अतीत में किए गए पाप उन्हें चैन से सोने नहीं दे रहे हैं। वह आज भी हिंसा में संलिप्त हैं और बुरी मौत मारे जा रहे हैं। ब्रिटेन जो कभी 1947 में भारत को सांप्रदायिक आधार पर बांट कर गया था और मुसलमानों का हितैषी बनता था, आज इस्लामिक आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित है। वहां की सड़कों पर इस्लाम को मानने वालों ने वहां के मूल निवासियों का निकलना बंद कर दिया है। इतिहास जब अपनी परिक्रमा पूर्ण करता है तो वह बड़ी भयानक होती है। इसी को नियति कहते हैं।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag


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