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तुम्हारे कुंवारे नयन,अनंत नेह सिंधु से

तुम्हारे कुंवारे नयन,अनंत नेह सिंधु से

कुमार महेंद्र
अंतरंग विमल ज्योत,
प्रीत पथ भव्य लगन ।
मृदुल मधुर चाह बिंब,
तन मन अनंत मगन ।
रम्य सौम्य मोहक छवि ,
प्रेम तरंग हृदय बिंदु से।
तुम्हारे कुंवारे नयन,अनंत नेह सिंधु से।।


जनमानस व्यवहार अंतर,
संवाद उन्मेष यौवन उभार ।
परिवार समाज रिश्ते नाते,
बाधा_राह प्रणय बहार ।
हर घड़ी हर पहर जीवन,
शीतल लावण्य सदृश इंदु से ।
तुम्हारे कुंवारे नयन,अनंत नेह सिंधु से ।।


दृष्टि सृष्टि संपूर्ण क्षेत्र ,
हर जगह मनमोहक रूप ।
राग रंग श्रृंगार परिधान,
सब प्रिय रूचि अनुरूप ।
निशि दिन अधर पटल,
स्वर_मधुरिम निर्मल मधु से ।
तुम्हारे कुंवारे नयन,अनंत नेह सिंधु से ।।


अंतर्मन घुंघुरू मृदुल लय,
मिलन विरह भाव प्रवाह ।
दर्शन आनन रमणीयता ,
मस्त मलंग हिलोर अथाह ।
अप्रतिम तरुण सौरभ संग,
रग रग आह्लाद अमृत अंबु से ।
तुम्हारे कुंवारे नयन,अनंत नेह सिंधु से।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)दिनांक 16/03/2026
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