"उत्कर्ष की अंतर्ध्वनि"
पंकज शर्मा
मित्रों जयाकांक्षा केवल बाह्य उपलब्धियों की लालसा नहीं, अपितु आत्मा के गहनतम स्पंदनों की पुकार है। जब मनुष्य अपनी सीमाओं के पार जाने की आकांक्षा से उद्वेलित होता है, तभी सिद्धि का प्रथम प्रकाश उदित होता है। यह प्रगाढ़ वांछा उसे साधारणता के जड़त्व से मुक्त कर, अनंत संभावनाओं के आकाश में उड़ान भरने की प्रेरणा देती है। इस प्रक्रिया में संघर्ष केवल साधन बन जाता है और लक्ष्य, आत्म-परिष्कार का माध्यम।
वास्तव में, अपनी चरम संभावनाओं को स्पर्श करने की व्याकुलता ही वह अग्नि है, जो व्यक्तित्व को तपाकर कुंदन बना देती है। यह उत्कंठा मनुष्य को निरंतर आत्मावलोकन और साधना के पथ पर अग्रसर करती है। जब यह चेतना जाग्रत होती है, तब आत्म-उत्कर्ष के कपाट स्वतः उन्मुक्त हो जाते हैं और जीवन, एक उच्चतर अर्थ की प्राप्ति की दिशा में प्रवाहित होने लगता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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