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गया जिले का ऐतिहासिक त्रिकोण और सांस्कृतिक वैभव

गया जिले का ऐतिहासिक त्रिकोण और सांस्कृतिक वैभव

सत्येंद्र कुमार पाठक
मोक्ष और मेधा की भूमि बिहार का गया जिला केवल पितृपक्ष और पिण्डदान की वेदी भर नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना, स्थापत्य कला और जल-संस्कृति के उस उत्कर्ष का साक्षी है, जिसने सहस्राब्दियों तक आर्यावर्त का मार्ग प्रशस्त किया। फल्गु, निलांजन और मोहना जैसी नदियों की गोद में विकसित हुई यहाँ की सभ्यता ने मौर्यों के शिलालेखों से लेकर पाल राजाओं की कांस्य प्रतिमाओं तक एक अटूट निरंतरता को बनाए रखा है। गया जिले के ऐतिहासिक मानचित्र पर उभरने वाले केंद्र—कुर्किहार, जेठियन, तपोवन, कोंच और कौआडोल—न केवल स्थापत्य के चमत्कार हैं, बल्कि वे प्राचीन मगध की राजनैतिक और आध्यात्मिक शक्ति के जीवंत दस्तावेज हैं।
कुर्किहार: धातु-शिल्प और बौद्ध मेधा का वैश्विक केंद्र गया-नवादा मार्ग पर स्थित वजीरगंज प्रखंड का कुर्किहार गांव प्राचीन काल में 'कुक्कुटपाद गिरि' के नाम से विख्यात था। शोधपरक दृष्टिकोण से देखें तो यह स्थल पालकालीन (8वीं से 12वीं शताब्दी) धातु-शिल्प कला का सबसे बड़ा और संपन्न केंद्र था। कांस्य मूर्तियों का भंडार: 1930 के दशक में यहाँ से प्राप्त 226 कांस्य प्रतिमाओं ने वैश्विक पुरातत्व जगत को चौंका दिया था। इन मूर्तियों की विशेषता इनकी 'लॉस्ट वैक्स' (Lost Wax) पद्धति और उन पर चढ़ी सोने जैसी चमक वाली पॉलिश है। ये मूर्तियाँ दर्शाती हैं कि गया के कारीगरों को धातु-विज्ञान (Metallurgy) का गहन ज्ञान था। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विहार: चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार, कुर्किहार एक उच्च स्तरीय शिक्षण केंद्र था। यहाँ जावा, सुमात्रा और तिब्बत के भिक्षुओं के आवागमन के प्रमाण मिले हैं। यहाँ का विशाल टीला आज भी अपने भीतर एक महान विश्वविद्यालय के अवशेष दबाए बैठा है, जो नालंदा के समकालीन था।
जेठियन (यष्टिवन): राजसत्ता और अध्यात्म का ऐतिहासिक गलियारा बोधगया और राजगीर के बीच स्थित जेठियन (प्राचीन यष्टिवन) मगध की राजनैतिक और धार्मिक संधि का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहाँ इतिहास ने करवट ली थी।।बुद्ध और बिम्बिसार का मिलन: बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, ज्ञान प्राप्ति के उपरांत जब बुद्ध राजगीर की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब मगध नरेश बिम्बिसार ने इसी 'बांसों के जंगल' (यष्टिवन) में उनका स्वागत किया था। यह घटना भारत के इतिहास में 'धर्म' (बुद्ध) और 'दंड' (राज्यसत्ता) के बीच के समन्वय का पहला बड़ा प्रमाण है। : जेठियन की पहाड़ियाँ प्राकृतिक रूप से मगध की राजधानी राजगीर की रक्षा करती थीं। यहाँ के प्राचीन दुर्ग और दीवारों के अवशेष बताते हैं कि यह क्षेत्र केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि सामरिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।
तपोवन: जल-संस्कृति और प्राकृतिक चिकित्सा का उद्गम जेठियन के सान्निध्य में स्थित तपोवन गया की 'जल-संस्कृति' का सर्वोत्तम उदाहरण है। यहाँ की पहाड़ियों से निकलने वाले गर्म जल के स्रोत (Hot Springs) प्राचीन भारतीय विज्ञान और आस्था के संगम हैं। गन्धक युक्त जल: वैज्ञानिक दृष्टि से तपोवन के कुंडों का जल सल्फर युक्त है, जो चर्म रोगों के निवारण के लिए प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में इसे 'प्राकृतिक आरोग्य केंद्र' के रूप में जाना जाता था।
ऋषि परंपरा: सनातन परंपरा में इसे सप्तऋषियों की तपस्थली माना गया है। मकर संक्रांति के अवसर पर यहाँ लगने वाला मेला गया की लोक-संस्कृति और जल-पूजन की परंपरा को जीवित रखता है। कोंच: ईंट-स्थापत्य और धार्मिक समन्वय का शिखर गया के उत्तर-पश्चिम में स्थित कोंच का 'कोंचेश्वर महादेव मंदिर' उत्तर-गुप्त कालीन (7वीं शताब्दी) वास्तुकला का एक दुर्लभ जीवित साक्ष्य है। नागर शैली का प्रारंभिक रूप: यह मंदिर ईंटों से निर्मित है और इसकी बनावट महाबोधि मंदिर के समान 'पिरामिडल' शिखर युक्त है। यह मंदिर स्थापत्य के विकास क्रम को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी है। शैव-वैष्णव समन्वय: मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग और दीवारों पर उकेरे गए भगवान विष्णु के दशावतार के पैनल यह सिद्ध करते हैं कि गया क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच गहरा सद्भाव था।
गया जिले का बेलागंज प्रखण के कौआडोल: पाषाण शिल्प और खुले आसमान का संग्रहालय बराबर पर्वत समूह की तलहटी में स्थित कौआडोल पर्वत शिला-कर्तन कला का अद्भुत नमूना है। विशाल बुद्ध प्रतिमा: यहाँ पत्थर को तराश कर बनाई गई भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा पालकालीन मूर्तिकला के सूक्ष्म विवरणों को दर्शाती है। उनके वस्त्रों की सिलवटें और मुख की शांति आज भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। शैल-चित्रण: पर्वत की ऊँची शिलाओं पर महिषासुर मर्दिनी, गणेश और सूर्य की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। यह स्थल यह प्रमाणित करता है कि प्राचीन गया में पहाड़ केवल भौगोलिक बाधाएँ नहीं, बल्कि कलाकारों की कल्पनाशक्ति की 'कैनवास' थे।
: गया का ऐतिहासिक त्रिकोण और संरक्षण की आवश्यकता का कुर्किहार की धातु कला, जेठियन की राजनैतिक गरिमा, तपोवन की जल संस्कृति, कोंच का ईंट स्थापत्य और कौआडोल का पाषाण शिल्प मिलकर गया जिले के उस 'ऐतिहासिक त्रिकोण' का निर्माण करते हैं, जो विश्व सभ्यता को भारत की देन है। यह विडंबना ही है कि बोधगया के वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर होने के बावजूद, ये सहायक केंद्र उपेक्षा का शिकार रहे हैं। शोधपरक दृष्टि से इन स्थलों का विकास न केवल बिहार के गौरव को पुनर्स्थापित करेगा, बल्कि 'बुद्ध ट्रेल' और 'मगध सर्किट' को पूर्णता प्रदान करेगा। गया की यह गौरवगाथा मिट्टी, पत्थर और पानी के माध्यम से हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करती है।
संदर्भ सूची: ह्वेनसांग का यात्रा वृत्तांत (सी-यू-की) , पटना संग्रहालय की पुरातात्विक रिपोर्ट (कुर्किहार भंडार) , मगध का प्राचीन इतिहास और पुरातत्व - डॉ. ए.एस. अल्तेकर , गया जिला गजेटियर 1906 , 1957 मगध क्षेत्र की विरासत , बराबर , मंगधानचल


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