आहिस्ता आहिस्ता
आहिस्ता आहिस्ता चल तू ,तीव्रता में शीघ्र थक जाएगा ।
या तो गिर पड़ेगा तू गड्ढे में ,
या जवानी में पक जाएगा ।।
जीवन कहता चलते ही रहो ,
चलते ही रह तुम रुको नहीं ।
उम्र कहता तू चलता ही रह ,
चले ही रहो तुम थको नहीं ।।
दौड़कर चलना रुक जाना है ,
रुक जाना ही चुक जाना है ।
रुकना गिर जाना मर जाना ,
स्व कर्मपथ से मुक जाना है ।।
उम्र कहे चलो तुम आहिस्ता ,
जवानी देख इतराओ नहीं ।
लोभ क्रोध ईर्ष्या को तू तज ,
कर्मपथ चल घबड़ाओ नहीं ।।
पढ़ते रहना औ बढ़ते रहना ,
करना भुल से भी भय नहीं ।
वर्तमान बीते तो भूत बनेगा ,
कर्मवान का होता क्षय नहीं ।।
गर्दभ राग कोई है लय नहीं ,
गर्दभ गर्दभ होता हय नहीं ।
गर्दभ रहता गर्दभ ही सदा ,
गर्दभ राग का है जय नहीं ।।
शब्दार्थ : मुक जाना = मुकर जाना , हय = अश्व , घोड़ा
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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