विलाप
अरुण दिव्यांशनहीं तू विलाप कर ,
नहीं अभिशाप कर ,
जीवन चार दिन का ,
आ वार्तालाप कर ।
मन को तू वश कर ,
निज कीर्ति यश कर ,
दुर्जन होंगे विलुप्त ,
मत कहीं डर कर ।
नहीं तू पाप कर ,
ईश्वर का जाप कर
समझदारी आप कर ,
मत तू परिताप कर ।
दुर्जन भी आऍंगे ,
आकर चले जाऍंगे ,
सज्जन भी आऍंगे ,
नहीं तू प्रलाप कर ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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