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विवेक की जागृति: भय और अंधविश्वास के बंधनों से मुक्ति का मार्ग

विवेक की जागृति: भय और अंधविश्वास के बंधनों से मुक्ति का मार्ग

सत्येन्द्र कुमार पाठक
चेतना और आवरण मानव चेतना की सबसे बड़ी शक्ति उसकी स्वाभाविक जिज्ञासा और विवेक है। किंतु, इतिहास और मनोविज्ञान गवाह हैं कि भय और अंधविश्वास वे दो प्रमुख आवरण हैं जो इस प्रकाश को ढक लेते हैं। जब मनुष्य अज्ञात के भय से त्रस्त होता है, तो वह सत्य की कठिन खोज के स्थान पर परंपराओं और मान्यताओं के अंधे अनुकरण में झूठा संतोष खोजने लगता है। विचार का प्रकाश तभी प्रज्वलित होता है जब मन स्वतंत्र होकर प्रश्न करने का साहस जुटाता है । जिज्ञासा बनाम जड़ता के इतिहास साक्षी है कि जिन समाजों ने जिज्ञासा और तर्क की प्रतिष्ठा की, वही प्रगति के शिखर तक पहुँचे। सुकरात से लेकर गैलीलियो तक, हर उस व्यक्ति को दमन का सामना करना पड़ा जिसने स्थापित अंधविश्वासों पर प्रश्न उठाया। सुकरात ने 'द्वंद्वात्मक पद्धति' से समाज को सोचना सिखाया, तो गैलीलियो ने वैज्ञानिक प्रमाणों से चर्च की रूढ़ियों को चुनौती दी । जब यूरोप ने 'अंधकार युग' (Dark Ages) के भय को त्यागकर प्रकृति का अन्वेषण शुरू किया, तभी आधुनिक विज्ञान और कला का जन्म हुआ। तर्क और समाज सुधार के लिए भारतीय संदर्भ में, अंधविश्वास के विरुद्ध युद्ध अत्यंत प्रभावशाली रहा है। यहाँ के मनीषियों ने सिद्ध किया कि मुक्ति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक होनी चाहिए। राजा राममोहन राय: इन्होंने सती प्रथा जैसी कुरीतियों को शास्त्रार्थ और तर्क के आधार पर चुनौती दी, जिससे समाज में 'विवेक' का संचार हुआ। स्वामी दयानंद व विवेकानंद: इन्होंने 'अभय' का संदेश दिया। विवेकानंद के अनुसार, भय ही समस्त दुखों और अंधविश्वासों की जड़ है। सत्य के लिए सब कुछ त्यागा जा सकता है, पर सत्य को किसी भी रूढ़ि के लिए नहीं। ज्योतिबा फुले: इन्होंने शिक्षा को चेतना का आधार माना। उनके अनुसार 'अविद्या' ही वह अंधकार है जिससे मानसिक गुलामी पैदा होती है।। दार्शनिक आधार: प्रश्न ही वह दीप है । दर्शन की दृष्टि में, प्रश्न करना केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि सत्ता की संरचना और जड़ मान्यताओं को चुनौती देना है। बुद्ध का मार्ग: 'अप्प दीपो भव' का सिद्धांत मनुष्य को स्वयं का प्रकाश बनने की प्रेरणा देता है, जहाँ किसी भी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जाता कि वह प्राचीन है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह तर्क की कसौटी पर खरी है। अस्तित्ववादी स्वतंत्रता में दार्शनिकों का मानना है कि अंधविश्वास अक्सर जिम्मेदारी से बचने का रास्ता है। स्वतंत्र विचार का साहस ही मनुष्य को 'पराधीनता की अदृश्य बेड़ियों' से मुक्त करता है।
सामाजिक अन्वेषण और भविष्य की चुनौतियां का आज के दौर में अंधविश्वास ने नए रूप ले लिए हैं। 'डिजिटल अंधविश्वास' और 'वैचारिक पूर्वाग्रह' आज की नई बेड़ियाँ हैं। सूचना बनाम विवेक: सूचनाओं के महासागर में विवेक का अभाव मनुष्य को फिर से जड़ बना सकता है। आधुनिक समाज की वास्तविक मुक्ति उसके विचारों की निरंतर स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण में निहित है। जिज्ञासा का लोकतंत्रीकरण: किसी भी समाज की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने सबसे कमजोर व्यक्ति को भी प्रश्न पूछने का कितना साहस और अवसर प्रदान करता है।भय और अंधविश्वास मनुष्य को सिकोड़ते हैं, जबकि जिज्ञासा उसे विस्तार देती है। जब व्यक्ति भय से ऊपर उठकर सत्य का अन्वेषण करता है, तभी वह स्वयं को और अपने समाज को मुक्त कर पाता है। प्रश्न ही वह दीप है जो अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान और जागृति की दिशा दिखाता है। समाज की वास्तविक प्रगति ऊँचे भवनों में नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निर्भय विचारों में बसती है।
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