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जीते-जी इलाहाबाद के बहाने......

जीते-जी इलाहाबाद के बहाने......

डॉ अवधेश कुमार अवध
सर्वप्रथम जीते-जी इलाहाबाद की लेखिका को इलाहाबाद सहित साहित्य अकादमी (हिंदी) महा सम्मान मिलने हेतु हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। कोरोना काल में मरने वाले मर रहे थे और जीने वाले जीने की नई -नई राहें खोज रहे थे। दबे और अविकसित शौक को पुनर्जागृत कर रहे थे। मौत को सामने देखकर कई लोग आंख मिचौली भी खेल रहे थे। यह वही कोराना काल (2020-21) था जिसमें जन साधारण सिर्फ रोना रो रहा था, चतुर सुजान आपदा में अवसर तलाश रहे थे और ममता कालिया जैसी परिपक्व लेखिका यादों के महासागर में डूबकर जीते-जी इलाहाबाद गढ़ रही थीं।


जीते-जी इलाहाबाद! लेखिका द्वारा लिखित न केवल एक संस्मरण है अपितु इलाहाबाद का मानवीकरण भी है। इलाहाबाद की गंगा जमुनी संस्कृति का दस्तावेज भी है। विश्वविद्यालयी उत्थान-पतन का आख्यान भी है। कवियों-गलियों- त्रिवेणी की सीढ़ियों और नव-पुरातन पीढ़ियों के सांस्कृतिक आवागमन का रिपोर्ताज भी है। सब मिलाकर निराला के "तोड़ती पत्थर" से इलाहाबाद के पुनः प्रयागराज बनने तक की साहित्यिक डायरी भी है जीते-जी इलाहाबाद।


इलाहाबाद आधिकारिक रूप से 2018 में पुनः प्रयागराज बना। उत्तर प्रदेश सरकार के अगुआ माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दृढ़ संकल्प से ही यह सम्भव हो सका। प्रयागराज को फिर से उसका नाम वापस मिलना निश्चय ही गर्व एवं गौरव का विषय है। इसके साथ एक सवाल यह व्युत्पन्न होता है कि प्रबुद्ध लेखिका अपनी पुस्तक में इस परिवर्तन को किस रूप में ले रही है? लेखिका की संस्मृति इलाहाबाद से जुड़ी है न कि प्रयागराज से। शायद इसलिए ही लेखिका ने प्रयागराज को नजर अंदाज करते हुए इलाहाबाद नामक संज्ञा का ही सजीव चित्रण किया है। करना भी चाहिए क्योंकि अतीत पर किसी का भी जोर नहीं होता, अधिकार नहीं चलता!


सोशल मीडिया ने प्रायः हर किसी को अपनी ओर खींचा है। आदरणीया ममता कालिया जी भी इससे अछूती नहीं हैं। उनकी विगत की पोस्ट देखकर यह समझना बहुत सरल है कि वे राहुल गांधी में देश का बेहतर भविष्य देखती हैं। देश में हो रहे बहुमुखी बदलाव को नकारात्मक मानती हैं। लेखिका का यह दृष्टिकोण प्रयागराज होने के बावजूद भी जीते-जी इलाहाबाद के नामकरण पर संदेह पैदा करता है। इसे मात्र साहित्यिक न मानते हुए राजनीतिक नजरिए से देखने को प्रोत्साहित करता है। माननीय योगी बाबा के निर्णय को नकारने का ठोस कारण बनता है। बदलाव को असहिष्णु के चश्मे से देखना चिंताजनक है। फिर भी लेखिका इसी बदलाव के तहत साहित्य अकादमी से सम्मानित होना सहर्ष स्वीकार करती हैं।


एक और अहम् सवाल यह उभरता है कि क्या साहित्य अकादमी भी नाम परिवर्तन को सहन नहीं कर पा रही है। किसी पुस्तक के चयन में क्या शीर्षक को महत्वहीन माना जा सकता है? या जानबूझकर सरकारी परिवर्तन को नकारने वाली पुस्तक के बहाने अपना विरोध या असहयोग दर्ज किया गया है? एक पार्टी होते हुए भी उत्तर प्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार के बीच की जोर आजमाइश से कोई अंजान नहीं है। अगर इस नजरिये से देखा जाए तो यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या केन्द्र सरकार ने अकादमी के माध्यम से योगी बाबा के निर्णय को नकारा है? या केन्द्र सरकार हिंदुत्व की छवि भाजपा शासित राज्यों को सौंपकर खुद धर्मनिरपेक्ष/ पंथ निरपेक्ष या गैर हिंदुत्व तुष्टीकरण की राह पर चलने का संकेत दे रही है? जो भी हो पर यह सिर्फ मतभेद ही नहीं बल्कि मनभेद का परिचायक भी है।


निश्चित ही पावन त्रिवेणी की धरा साहित्य एवं संस्कृति के लिए बहुत उर्वर रही है। महाप्राण निराला, महादेवी वर्मा और गुप्त बंधुओं की लेखकीय कर्मस्थली भी रही है। इसलिए अंततः हिंदी की झोली और इलाहाबाद की खोली में होली के फौरन बाद एक और साहित्य अकादमी सम्मान आने की बधाई एवं शुभकामनाएं।




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