सभी को नववर्ष, विक्रम संवत 2083 की हार्दिक शुभकामनाएँ।
डॉ मुकेश असीमित
आज, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च 2026) के इस पावन दिन से एक नया संवत्सर आरंभ हो रहा है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ भी होता है—एक ऐसा समय जब प्रकृति भी नवजीवन का उत्सव मनाती प्रतीत होती है। इस वर्ष का नाम ‘रौद्र संवत्सर’ है, जिसमें राजा बृहस्पति (गुरु) और मंत्री मंगल माने गए हैं। विशेष बात यह भी है कि यह वर्ष अधिक मास के कारण 13 महीनों का होगा—समय की गणना का यह सूक्ष्म संतुलन अपने आप में अद्भुत है।
थोड़े ही दिनों बाद, 22 मार्च 2026 से शक संवत 1947 का भी आरंभ होगा। यह जानना रोचक है कि विक्रम संवत 57 ईसा पूर्व से और शक संवत 78 ईस्वी से प्रारंभ हुआ—दोनों के बीच 135 वर्षों का अंतर है। समय को समझने की यह परंपरा केवल गणना नहीं, बल्कि एक गहरी वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि का परिचायक है।
वास्तव में, जब हम पंचांग, तिथि, नक्षत्र, राशि, कुंडली जैसे विषयों को समझने की कोशिश करते हैं, तो पता चलता है कि यह सब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित खगोलीय और गणितीय प्रणाली पर आधारित है। सूर्य सिद्धांत जैसी प्राचीन ग्रंथ परंपराएँ इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वजों ने समय, ग्रहों और प्रकृति के संबंध को कितनी सूक्ष्मता से समझा था।
अजीब बात यह है कि आज हम अपने ही इस ज्ञान को या तो अनदेखा कर देते हैं या उसे केवल ‘आस्था’ के दायरे में सीमित कर देते हैं। जबकि ज़रूरत है इसे समझने की—तर्क के साथ, जिज्ञासा के साथ। हम अक्सर कहते हैं कि आज भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण कम हो रहा है, लेकिन क्या हमने कभी यह गंभीरता से सोचा कि हमारे अपने अतीत में कितना वैज्ञानिक वैभव मौजूद था?
कहीं ऐसा तो नहीं कि इतिहास के कुछ दौर—विशेषकर औपनिवेशिक शासन—ने हमारे भीतर हीनता का एक बीज बो दिया, जिससे हम अपनी ही परंपराओं को कमतर आंकने लगे? धीरे-धीरे एक ऐसी छवि गढ़ दी गई कि हम केवल ज्योतिष, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वासों का देश हैं, जबकि सच्चाई इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरी है।
खैर, इस विषय पर कहने को बहुत कुछ है, और मैं समय-समय पर “बात अपने देश की” के माध्यम से ऐसे विषयों पर अपने विचार साझा करता रहता हूँ। यदि आपका मन और समय अनुमति दे, तो वहाँ अवश्य पधारें—शायद आपको अपने ही अतीत के कुछ नए आयाम देखने को मिलें।
और हाँ, एक छोटी-सी बात—मैंने इसे ‘हिन्दू नववर्ष’ नहीं कहा। क्योंकि जैसे हम जनवरी में आने वाले नववर्ष को ‘ईसाई नववर्ष’ नहीं कहते, वैसे ही यह भी केवल किसी एक पहचान में सीमित नहीं है। उसका अपना प्रशासनिक, वैश्विक महत्व है, और इसका अपना सांस्कृतिक, प्राकृतिक और जीवन-चक्र से जुड़ा महत्व।
हमारी ऋतुएँ, हमारे संस्कार—जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुहूर्त, कुंडली मिलान, तीज-त्योहार—ये सब पंचांग के अनुसार ही चलते हैं। यानी यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
एक बार फिर, आप सभी को इस नव संवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ—
यह वर्ष आपके जीवन में संतुलन, ऊर्जा और नवचेतना लेकर आए। 🌸
डॉ मुकेश असीमित मेल ID -drmukeshaseemit@gmail.com
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