जनेऊ ( यज्ञोपवीत )
जय प्रकाश कुवंर
हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार उपनयन संस्कार सोलह संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार है, जो आमतौर पर ९ से १३ वर्ष की आयु के बीच होता है। जनेऊ या यज्ञोपवीत उपनयन संस्कार के बाद ही पहना जाता है। यह तीन धागों वाला एक पवित्र सुत्र होता है, जिसे उपनयन संस्कार के समय बालकों को धार्मिक रीति रिवाज से प्रथम बार पहनाया जाता है।
जनेऊ मुख्यरूप से कच्चे सूत (रूई के धागे ) से तैयार किया जाता है। इसे बनाने की विधि काफी सुक्ष्म और धार्मिक होती है। जनेऊ के तीन धागों में प्रत्येक में तीन तंतु के हिसाब से कुल नौ तंतु होते हैं, इसलिए इसे नौ गुन या नौ तंतु का जनेऊ कहते हैं। ये नौ तंतु नौ देवताओं जैसे सूर्य, चंद्र, अग्नि आदि का प्रतीक माने जाते हैं। जनेऊ के तीन धागों के सिरों को आपस में जोड़ने के लिए गांठ लगाई जाती है, जिसे ब्रह्मग्रंथि कहते हैं। आमतौर पर ब्रह्मग्रंथि में पांच गांठ लगाई जाती है जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक मानी जाती हैं। जनेऊ बनाने के बाद उसे हल्दी से रंगा जाता है ताकि वह पीला हो जाए। हरेक शुभ काम में पीला जनेऊ ही पहना जाता है।
शास्त्रों के अनुसार एक जनेऊ की कुल लंबाई ९६ अंगुल होती है। यह माप एक वयस्क व्यक्ति के अपने हाथ के अंगुठे को छोड़कर शेष चार अंगुलियों को २४ बार लपेटने के बराबर होता है। जनेऊ के तीन सुत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक, देवॠण, पितृऋण, एवं ऋषिऋण के प्रतीक तथा सत्व, रज और तम के प्रतीक माने जाते हैं।
यह जनेऊ का पवित्र धागा व्यक्ति के बांये कंधे के उपर तथा दांई भुजा के नीचे धारण किया जाता है। ब्रह्मचारी तीन और विवाहित पुरुष छ: धागों का जनेऊ धारण करता है। यह उनके धार्मिक और जिम्मेदारियों का प्रतीक है।
जनेऊ धारण करने से व्यक्ति को हर समय अपनी मर्यादा और कर्तव्यों का एहसास रहता है, जिससे वे बुरे कर्मो से दूर रहते हैं। जनेऊ धारण करने और उतारने के कुछ मंत्र होते हैं।
१ . जनेऊ धारण करने का मंत्र :
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रयं प्रतिमु़ंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं
बलमस्तु तेज: ।।
२. पुराना जनेऊ उतारने का मंत्र :
ॐ एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया
जीर्णत्वात्तवत्परित्यागो गच्छ सूत्र
यथासुखम्।।
पुराने जनेऊ को उतारने के बाद उसे कचरे में नहीं फेंका जाता है। उसे किसी नदी, जलस्रोत अथवा मिट्टी के नीचे सम्मानपूर्वक विसर्जित कर दिया जाता है।
मल मूत्र त्याग करने के समय जनेऊ को दाहिने कान पर लपेट कर रखना चाहिए। इस समय शरीर अशुद्ध माना जाता है। पवित्र जनेऊ मल मूत्र त्यागने के समय कमर से उपर रहने से अशुद्ध नहीं होता है। इसके अलावा शौच के समय जनेऊ को कान पर चढ़ाना स्वच्छता और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। सर्वप्रथम तो यह अपवित्र होने से बचता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दाहिने कान में गंगा तथा और अन्य पवित्र देवताओं का निवास रहता है। इसलिए जनेऊ को इस कान पर धारण करने से इसकी पवित्रता बनी रहती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कान के पास की नसों पर दबाव पड़ने से आंतें साफ होती हैं। कान पर जनेऊ को लपेटने से वहाँ की नसों पर दबाव पड़ता है। इससे कब्ज तथा अन्य पेट संबंधित समस्याओं में लाभ मिलता है। इससे हृदयरोग तथा ब्लडप्रेशर जैसे विमारियों में भी राहत मिलती है। इससे एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
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