आने वाली है अब होली
डॉ रश्मि प्रियदर्शनी
आमों की डाली पर झूला झूल-झूल कोयलिया बोली।
कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली?
बाहर निकल निहारो त्रिभुवन का मोहक सौंदर्य निराला।
धरती का श्रृंगार अनूठा, मंत्रमुग्ध कर देने वाला।।
सूर्योदय की सुषमा देखो, अंबर के ललाट पर रोली।
कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली?
शीतलहर की जगह हवाएँ बहने लगीं सुखद अलबेली।
खेतों में लहराए सरसों, महक रही बागों में बेली।।
जिधर-जिधर पड़ती है दृष्टि, दिखाई देती है रंगोली।
कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली?
आलस त्याग जगो, देखो निद्रा का मौसम चला गया।
नहीं रह गया धुंध-कुहासा, हुलसित है जग, जोश नया।।
कर्म-पंथ पर बढ़ो, यही पल सबसे अच्छा है हमजोली।
कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली?
जीव-जंतुओं के भीतर लग गई उमड़ने मधुर पिपासा।
जीवन की वैविध्यपूर्णता का रस चखने की जिज्ञासा।।
मौन मौन हो गया, गूंजने लगी चतुर्दिक हँसी-ठिठोली।
कब तक घर में बंद रहोगे, आने वाली है अब होली?










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