खुद की तुलना..
संजय जैनवर्तमान को देखकर हम
आतित को याद कर रहे।
अपनी करनी का भी देखो
कैसे फल अब भोग रहे।
दोनो युग के कामों का
तुलना जो आज कर रहे।
और अपने बच्चों को हम
पुरानी बातें याद करा रहे।।
ले ले कर उधार पैसे
देखो निकम्में बन गये।
भेड़ चाल में दौड़ कर
अपना विवेक खो रहे।
मुफ्त के खाने पीने की
अब तो आदत बन गई।
जिसके कारण देखो अब
काम धाम को भूल गये।।
धीरे धीरे दीमक जैसे
संस्कारो को चट कर रहे।
बहिन बेटी बहू आदि को
संस्कारो से नंंगा कर रहे।
हराम खोरी का आलम देखो
कैसे सिर चढ़कर नाच रहा।
अपनी संस्कृति का देखो
खुद ही हत्या करा रहा।।
याद बहुत जब आती है
तो अतीत में खो जाता हूँ।
अपने पारिवारिक संस्कारों में
फिर सोचकर डूब जाता हूँ।
तब खुली आँखों से फिर देखो
अपने आँसू बहता रहता हूँ।
और कुल की मर्यादाओं को
दिलसे बहुत याद करता हूँ।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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