'शरणम् गच्छामि': ईश्वरीय सहायता और व्यक्तिगत पुरुषार्थ का दर्शन
लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारतीय दर्शन और अध्यात्म के केंद्र में भगवान श्री कृष्ण का व्यक्तित्व एक मार्गदर्शक, सखा और सर्वोच्च सत्ता के रूप में विद्यमान है। भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता के १८वें अध्याय के ६६वें श्लोक में कहते हैं कि
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थात, “सब धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा।” यहाँ 'शरण में आना' केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक और आध्यात्मिक समर्पण है। यह सिद्धांत कि ईश्वर उसी की मदद करता है जो उसके पास आता है, न केवल आध्यात्मिक जगत में सत्य है, बल्कि व्यावहारिक जीवन में भी सफलता का मूल मंत्र है।
अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि ईश्वर उनकी पुकार नहीं सुन रहा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आपने पुकारा है? बिना द्वार खटखटाए कोई दरवाजा नहीं खुलता।
जैसे प्यासा व्यक्ति कुएं के पास जाता है, कुआं उस प्यासे के पास नहीं आता। यह जीवन का एक मूलभूत नियम है। जब हम किसी व्यक्ति से मदद चाहते हैं, तो हमें अपने अहंकार को छोड़कर पहला कदम आगे बढ़ाना होता है।
सहायता एक प्रवाह है, जो तब संचालित होता है जब हम हाथ बढ़ाते हैं और दूसरे व्यक्ति को यह महसूस कराते हैं कि हम उनकी सहायता स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। 'पास जाना' इसी भावना को दर्शाता है, जो हमें यह एहसास दिलाता है कि सहायता लेने और देने के लिए हमें खुले दिल और दिमाग से आगे बढ़ना होगा।
हमारे अनुसार, किसी से मदद मांगना कमजोरी नहीं है, बल्कि यह एक समझदारी भरा कदम है। महाभारत में अर्जुन ने जब युद्ध के मैदान में हथियार डाले और कहा, “मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे शिक्षा दें,” तब भगवान कृष्ण ने गीता की शिक्षा दी। यह पल दर्शाता है कि सही समय पर सही मार्गदर्शन मांगना कितना महत्वपूर्ण है।
कई बार लोग अपने अहंकार के कारण मदद मांगने से हिचकिचाते हैं। उन्हें लगता है कि किसी के पास जाना उनकी कमजोरी है। जबकि सच्चाई यह है कि किसी महान व्यक्ति के पास जाना स्वयं को बेहतर बनाने का एक तरीका है। यह हमें नई चीजें सीखने और अपने ज्ञान को बढ़ाने में मदद करता है। जब हम किसी के पास जाते हैं और उनसे सीखते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है और हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अधिक प्रेरित होते हैं।
जब हम कृष्ण (या किसी भी सक्षम व्यक्ति) के पास जाते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि हमारी क्षमताएं सीमित हैं। यह स्वीकारोक्ति हमें नई ऊर्जा और ज्ञान प्राप्त करने के लिए तैयार करती है।
आज के समय में भी यह बात उतनी ही सच है। अगर आपको किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करना है, तो आपको शिक्षक से सीखना होगा। और अगर आपको अच्छा स्वास्थ्य चाहिए, तो आपको डॉक्टर से परामर्श लेना होगा।
भगवान कृष्ण के पास जाने का अर्थ केवल मंदिर जाना नहीं है। इसके तीन गहरे अर्थ हैं:
1. मानसिक साम्य:- अपने विचारों को अपने आदर्शों जैसे कि धर्म और कर्म के अनुकूल बनाना बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमें अपने जीवन में स्थिरता और शांति प्रदान करता है। जब हमारे विचार और आदर्श एक दूसरे के साथ मेल खाते हैं, तो हम अधिक आत्मविश्वास और संतुष्टि महसूस करते हैं।
2. कर्म का मार्ग:- कृष्ण कर्मयोग के प्रणेता हैं। उनके पास जाने का अर्थ है—अपने आलस्य को त्यागकर कर्म में प्रवृत्त होना।
3. विश्वास:- अटूट विश्वास कि जब मैं सही मार्ग पर चलूँगा, तो ब्रह्मांड की शक्तियां मेरी सहायता करेंगी।
पुरुषार्थ और कृपा दोनों ही जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। पुरुषार्थ से हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है, जबकि कृपा हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देती है। जब हम पुरुषार्थ और कृपा को संतुलित करते हैं, तो हम अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और संतुष्ट बना सकते हैं।
पुरुषार्थ का अर्थ है अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करना और अपने सपनों को पूरा करना। यह हमें अपने जीवन में आगे बढ़ने और नई ऊंचाइयों को छूने की प्रेरणा देता है। लेकिन पुरुषार्थ के साथ-साथ, कृपा भी बहुत महत्वपूर्ण है। कृपा से हमें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति मिलती है और हम अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों को पार कर सकते हैं।
जब हम पुरुषार्थ और कृपा को संतुलित करते हैं, तो हम अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और संतुष्ट बना सकते हैं। हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं और साथ ही जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं। यह संतुलन हमें जीवन की वास्तविकता को समझने और उसके अनुसार अपने जीवन को ढालने में मदद करता है।
इस संतुलन को बनाए रखने के लिए, हमें अपने जीवन में पुरुषार्थ और कृपा दोनों को महत्व देना होगा। हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, लेकिन साथ ही जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए कृपा की भी आवश्यकता होगी। जब हम इस संतुलन को बनाए रखेंगे, तो हम अपने जीवन को अधिक अर्थपूर्ण और संतुष्ट बना सकते हैं।
ईश्वरीय सहायता का अर्थ यह नहीं है कि हम भाग्य के भरोसे बैठ जाएं। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि यह पुरुषार्थ और कृपा का मिलन है। श्री कृष्ण ने अर्जुन की मदद की, लेकिन गांडीव को उठाने का काम अर्जुन को ही करना पड़ा। उन्होंने अर्जुन को सही रास्ता दिखाया, लेकिन उस रास्ते पर चलना भी अर्जुन को ही पड़ा।
अतः, जब आप किसी के पास सहायता के लिए जाते हैं, तो आप अपनी ओर से ५०% कार्य पूर्ण कर लेते हैं। शेष ५०% उस सत्ता या व्यक्ति की कृपा और सहयोग से पूर्ण होता है।
जब भगवान श्री कृष्ण हमें कहते हैं कि “मेरे पास आओ,” तो इसका मतलब है कि हमें अपनी पूरी क्षमता से कोशिश करनी चाहिए और फिर जो परिणाम होता है, उसे भगवान पर छोड़ देना चाहिए। यह वह जगह है जहां हमारे प्रयास खत्म होते हैं और भगवान की कृपा शुरू होती है।
यदि हम बिना कोई प्रयास किए ही मदद मांगते हैं, तो यह आलस्य कहलाता है। लेकिन अगर हम अपनी पूरी ताकत से मेहनत करते हैं और जब थक जाते हैं तब भगवान की शरण में जाते हैं, तो यह सच्चा समर्पण है।
भगवान श्री कृष्ण का यह संदेश कि “मैं उसी की मदद करता हूँ जो मेरे पास आता है", हमें जिम्मेदारी का महत्व सिखाता है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन के स्वयं रचयिता हैं। मदद उपलब्ध है, मार्गदर्शन भी उपलब्ध है, बस हमें अपने स्वार्थ और अहंकार के खोल से बाहर निकलकर उस विराट शक्ति या योग्य मार्गदर्शन की ओर कदम बढ़ाना होगा।
आज के समय में, जब सभी को अपने लक्ष्यों को पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, अकेले लड़ना और थक जाना आम बात है। लेकिन जब आप ऐसा महसूस करें कि आप अकेले नहीं जारी रख सकते, तो रुक जाएं और सोचें कि आपके पास कौन से विकल्प हैं। क्या आप ईश्वर में विश्वास करते हैं? क्या आपके पास कोई गुरु या अनुभवी मित्र है जो आपकी मदद कर सकता है? याद रखें, आपको पहला कदम उठाना होगा, तभी आप दूसरों से सहायता प्राप्त कर पाएंगे। लेखक डॉ राकेश दत्त मिश्र, दिव्य रश्मि पत्रिका के सम्पादक है |
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