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मातृभाषा: सांस्कृतिक अस्मिता का आधार

मातृभाषा: सांस्कृतिक अस्मिता का आधार

सत्येंद्र कुमार पाठक
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी भी सभ्यता की आत्मा होती है। वह संस्कारों की संवाहक और इतिहास की साक्षी है। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति, परंपरा और ज्ञान का खजाना विलुप्त हो जाता है। इसी चेतना को जागृत करने के लिए हर साल 21 फरवरी को संपूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की उत्पत्ति के पीछे संघर्ष और शहादत की एक मर्मस्पर्शी कहानी है। 1952 का भाषा आंदोलन: तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में अपनी मातृभाषा 'बांग्ला' को राजकीय दर्जा दिलाने के लिए छात्रों और आम नागरिकों ने आंदोलन किया। 21 फरवरी 1952 को ढाका मेडिकल कॉलेज के पास पुलिस की गोलियों से कई युवा शहीद हुए। उन शहीदों की याद में ढाका में 'शहीद मीनार' का निर्माण किया गया, जो आज भी भाषायी प्रेम का प्रतीक है।यूनेस्को की स्वीकृति: बांग्लादेश के इसी लंबे संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित किया।
वैश्विक संकल्प: संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2008 को 'अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष' घोषित कर इस बात पर जोर दिया कि बहुभाषावाद ही विश्व शांति और विकास का मार्ग है। भारत के हृदय स्थल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के एक विशाल भू-भाग (बुंदेलखंड) में बोली जाने वाली बुंदेलखंडी भाषा वीरता, प्रेम और भक्ति के रस से सराबोर है। आल्हा-ऊदल के किस्से हों या ईसुरी की फागें, बुंदेलखंडी की मिठास बेजोड़ है। पीढ़ियों का अंतराल: आज के दौर में बुंदेलखंडी बोलने वाले लोग तो बहुत हैं, लेकिन नई पीढ़ी (बच्चों) में इसके प्रति हीन भावना या अन्य भाषाओं के प्रति अत्यधिक लगाव देखा जा रहा है। कामकाज की भाषा न होने के कारण यह केवल बोलचाल तक सीमित रह गई है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। शासकीय प्रयोजन: सरकारी कार्यालयों और जन-संवाद के कार्यक्रमों में बुंदेलखंडी के प्रयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।डिजिटल उपस्थिति: सोशल मीडिया और आधुनिक माध्यमों पर बुंदेलखंडी साहित्य और संगीत का प्रचार-प्रसार। भाषा की सेवा करने वालों का सम्मान करना समाज का कर्तव्य है। इसी दिशा में लिन्ग्गुआपाक्स पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषायी विविधता के लिए दिया जाता है। खुशी का विषय है कि इस वर्ष (21 फरवरी 2026) काठमांडू, नेपाल में आयोजित एक गरिमामयी समारोह में फाउंडेशन नेपाल द्वारा सत्येन्द्र कुमार पाठक को 'मातृभाषा रत्न' की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा रहा है। ऐसे सम्मान न केवल व्यक्ति को बल्कि उस पूरी भाषायी विरासत को गौरवान्वित करते हैं।
"मातृभाषा" वह प्रथम गुरु है जो हमें दुनिया को देखना सिखाती है। बुंदेलखंडी जैसी समृद्ध बोलियों का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर बुंदेली का कर्तव्य है। यदि हम अपनी जड़ों से नहीं जुड़ेंगे, तो हम अपनी पहचान खो देंगे। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संकल्प लें कि हम अपनी मातृभाषा में बोलने में गर्व महसूस करेंगे और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखेंगे।"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।"
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