"शब्द से अर्थ तक"
पंकज शर्माशब्द पहले आते हैं—
जैसे दूर से आती कोई आहट,
अपरिचित, किंतु उपस्थित,
जिन्हें हम सुन तो लेते हैं
पर अभी पहचानते नहीं।
ज्ञान उन्हें आकार देता है,
उनकी ध्वनि को व्याकरण,
उनकी रेखाओं को संदर्भ;
वे अक्षर से अवधारणा बनते हैं,
और मन कहता है—मैं समझ गया।
किन्तु समझना केवल जानना नहीं,
जैसे मानचित्र देख लेना
यात्रा कर लेने के समान नहीं होता;
रेखाएँ मार्ग नहीं होतीं,
और दिशा अभी भी भीतर अनछुई रहती है।
अनुभव तब उतरता है—
धीरे, बिना घोषणा के,
जैसे वर्षा मिट्टी में समा जाती है;
और वही शब्द,
अचानक भीतर की गंध लेने लगते हैं।
तब अर्थ खुलता है
किसी परिभाषा की तरह नहीं,
बल्कि एक अनुभूति की तरह—
जिसे कहा नहीं जा सकता,
केवल जिया जा सकता है।
ज्ञान बाहर की ज्योति है,
वह दिखाता है आकार, सीमा, रूप;
अनुभव भीतर की आग है,
जो उसी रूप को
स्वत्व का स्पर्श देती है।
कभी-कभी हम शब्दों में रहते हैं
और अर्थ से वंचित रहते हैं;
और कभी मौन में भी
अर्थ की पूर्णता मिल जाती है—
क्योंकि अनुभव भाषा से आगे बढ़ जाता है।
तब ज्ञात होता है—
शब्द सीढ़ियाँ थे,
अर्थ शिखर नहीं, एक आंतरिक विस्तार है;
जहाँ ज्ञान संकेत भर है,
और अनुभव ही अंतिम अनुवाद।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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