पुरानी यादों का साथ
संजय जैनआज कदम फिर से मेरे
चल पड़े बाग की तरफ।
जहाँ मिलते थे हम दोनों
अक्सर हर शाम को।
और करते थे घंटो बातें
प्यार मोहब्बत की दिलसे।
इरादा नेक था दोनों का
इसलिए जिंदा रख पाये यादे।।
पर अब हालत हमारी
बहुत ही बदल गये है।
कसम जिनकी हम खाते थे
उन्हें जमाना खा गया है।
गलतियाँ इंसान करता है
जिसे वो खुद भोगता है।
फिर बसे बसाये घरों को
वो बर्बाद कर देता है।।
अब अल्फाज ही बचे है
जिन्हें हम गुन गुनाते है।
पुरानी यादों में फिर से
स्वंय को ले जा रहे है।
कभी उनको कभी खुदको
बस यादों में देख रहे है।
और अपने दिलके दर्द को
कम कर रहे है।।
हमारा दुख दर्द देखकर
नदी तालाब भी रोते है।
बाग के फूल पत्ती भी
सुख कर बस खड़े है।
न हिलते न झूमते है
बस बिखकर ये खड़े है।
जो हमारे दुख दर्द को
दिल से बाट रहे है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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