मनुस्मृति और भारतीय संविधान
डॉ राकेश कुमार आर्य
भारत पर विदेशी हमलावरों के हमला यद्यपि स्थाई रूप से भारत का कुछ नहीं बिगाड़ सके, परंतु यह कहना भी गलत होगा कि वह भारत का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाए। उन्होंने बहुत कुछ बिगाड़ दिया था। उन विदेशी राक्षसों से संघर्ष करते-करते हम अज्ञान और अविद्या के गहरे गड्ढे में गिर गए थे। जहां से निकलना बड़ा कठिन हो रहा था, लोगों को अपने लिए जंगलों में जाकर सुरक्षित स्थान खोजने पड़े। शिक्षा को छोड़कर सबसे बड़ी प्राथमिकता देश से विदेशी हमलावरों को भगाना हो गया था। उनके उस संघर्षपूर्ण जीवन के कारण हम अपना अस्तित्व बचाने में तो सफल हो गए, परंतु इतनी देर में हमारा संस्कृत विनाश बहुत अधिक हुआ।
जब देश अंग्रेजों के विरुद्ध अपना मुक्ति संग्राम लड़ रहा था, तब बार-बार देश का संविधान बनाने की मांग उठती रही थी।
अंत में ब्रिटिश सरकार ने भारत के लोगों की अपना संविधान बनाने की मांग को स्वीकार किया।
भारतीय संविधान की विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा जाता है कि यह संसार का सबसे बड़ा संविधान है। इस संविधान को बनाने के लिए ब्रिटिश काल में विधिवत एक संविधान सभा बनाई गई थी। जिसे स्वतंत्र भारत के लिए एक स्वतंत्र संविधान बनाने का दायित्व दिया गया था। इसके सभी सदस्य निर्वाचित सदस्य थे। विभिन्न सदस्यों की सहभागिता यह स्पष्ट करती है कि हमारा संविधान जन सहयोग से बनकर तैयार हुआ था अर्थात इसमें जन सहभागिता थी। हमारा वर्तमान संविधान 3 वर्ष 11 महीने और 18 दिन में बनकर तैयार हुआ था। जिसे बनाने के लिए व्यापक चिंतन मंथन हुआ था अनेक सदस्यों ने अपने विभिन्न प्रकार के विचार प्रस्तुत किए थे। किंतु इसके उपरांत भी यह संविधान भारतीय मनीषा बोध से वंचित ही रहा।
डॉ बीएन राव का विशेष पुरुषार्थ
1947 के अक्टूबर माह में संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बी.एन. राव ने संविधान का प्रथम प्रारूप तैयार किया था। इस प्रकार सर बी.एन.राव का एक विशेष योगदान और विशेष पुरुषार्थ भारतीय संविधान के निर्माण में देखा जा सकता है। बी. एन. राव द्वारा तैयार किए गए इस प्रारूप में कुल 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थीं। इस प्रकार कर बी राव ने भारतीय संविधान का मूल ढांचा तैयार किया। उनके इसी मूल ढांचे पर आगे चलकर वर्तमान संविधान की इमारत खड़ी हुई। उन्होंने भारी परिश्रम करके संविधान के इस पहले प्रारूप को तैयार किया था । 29 अगस्त 1947 को जब संविधान सभा ने अपनी एक प्रारूप समिति का गठन किया तो उसमें डॉ भीमराव अंबेडकर को सभापति के रूप में निर्वाचित किया गया। इस प्रकार डॉ भीमराव अंबेडकर की एक विशिष्ट भूमिका निश्चित कर दी गई कि वह प्रारूप समिति के सभापतित्व के अंतर्गत दिए गए दायित्वों का निर्वाह करेंगे। इस समिति के लिए निर्धारित किया गया था कि संविधान के जिन प्रावधानों / अनुच्छेदों पर संविधान सभा अपने चिंतन मंथन के पश्चात कोई निष्कर्ष निकालेगी, उसे वह इस प्रारूप समिति के पास भेजेगी। जिसका लेखन कार्य यह समिति करेगी।
इस समिति में अल्लादि कृष्ण स्वामी अय्यर , बी.एल. मित्तर कन्हैयालाल मानिक लाल मुंशी, गोपाल स्वामी आयंगर, डी.पी. खेतान और सैयद मोहम्मद सआब्दुल्ला को भी रखा गया था। कुछ समय पश्चात बी.एल. मित्तर के स्थान पर एन. माधवराव को नियुक्त किया गया था। 1948 में डीपी खेतान की मृत्यु हो गई तो उनके स्थान पर टी.टी.कृष्णामाचारी को नियुक्ति दी गई।
की गई 300 मनुओं की खोज
कुल मिलाकर हमारे संविधान के निर्माण के लिए उस समय देश की कुल जनसंख्या के दृष्टिगत लगभग 10 लाख लोगों पर एक सदस्य को चुना गया था। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि वर्तमान संविधान को बनाने के लगभग 300 संविधान निर्माता '५मनुओं ' की खोज की गई थी। वह भी संपूर्ण भूमंडल के लिए बनाए जाने वाले संविधान के लिए नहीं, केवल 32 - 33 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र के लिए अथवा देश के लिए बनाए जाने वाले संविधान के लिए इन मनुओं की खोज की गई थी। इन 300 मनुओं के पास देश का नया संविधान बनाने के लिए विभिन्न देशों के संविधान थे,विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं के अनुभव थे, और सबसे बड़ी बात थी कि इनके पास भारत सरकार अधिनियम 1935 का वह विस्तृत भाग भी था, जिसे यह यथावत स्वीकार करने पर सहमत थे।
हम अपनी संविधान निर्मात्री सभा के सभी सदस्यों के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए कहना चाहेंगे कि इसके उपरांत भी उनका संविधान समग्रता को समेटने वाला संविधान नहीं है । इस संविधान में भारतीय बौद्धिक प्रतिभा का कहीं दर्शन नहीं होता। मनुष्य को मनुष्य बनाकर उसे संसार के लिए एक उपयोगी नागरिक अथवा सदस्य बनाना इस संविधान के चिंतन दर्शन में कहीं भी नहीं झलकता। जहां मनु महाराज की मनुस्मृति एक पूर्ण व्यवस्था देने में सफल हुई है, वहां यह संविधान कुल मिलाकर राजनीतिक व्यवस्था के निकट ही सिमट गया है। यदि राजनीतिक व्यवस्था से इधर कहीं गया भी है तो वह बहुत अधिक भावपूर्ण ढंग से अपने विषय को स्पष्ट नहीं कर पाया है।
मनु जैसी कोई स्पष्ट और सुव्यवस्थित योजना अथवा सामाजिक,राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, आध्यात्मिक व्यवस्था इस संविधान के पास नहीं है। इसका अभिप्राय है कि यदि बड़ी संख्या किसी व्यक्ति या छोटी संख्या के जनसमूह के सामने बौद्धिक स्तर पर दुर्बल है तो उससे बड़े चमत्कार की अपेक्षा नहीं की जा सकती, यानी एक ओर 10 लोग हैं और दूसरी ओर एक व्यक्ति बौद्धिक क्षेत्र में विशाल अनुभव और विशाल बौद्धिक संपदा लिए खड़ा है तो वह व्यक्ति उन 10 व्यक्तियों पर भारी पड़ेगा। इस संविधान के द्वारा जिस प्रकार जनप्रतिनिधियों को नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है, उसमें भी उनकी योग्यता उनका चरित्र बल नहीं मानी गई है अपितु जो व्यक्ति अपने बाहुबल, छल-कपट , चालाकी से अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़ ले और उनका मत प्राप्त कर ले वही जनप्रतिनिधि बन जाता है।
संविधान सभा की विभिन्न समितियां
स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण के लिए लगभग डेढ़ दर्जन समितियों का गठन किया गया था। संविधान सभा की नियम समिति, संचालन समिति ,वित्त और कर्मचारी समिति के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद बनाए गए थे। डॉ राजेंद्र प्रसाद ही आगे चलकर देश के पहले राष्ट्रपति बने थे। संविधान सभा की परिचय पत्र समिति के अध्यक्ष अल्लादि कृष्ण स्वामी अय्यर बनाए गए थे। इसी प्रकार आवास समिति के अध्यक्ष डॉ पट्टाभि सीतारमैया, कार्य निर्धारण समिति के अध्यक्ष कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, राष्ट्रीय ध्वज के लिए तदर्थ समिति के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद, संविधान सभा के कृत्यों की समिति के अध्यक्ष जी.बी. मावलंकर , राज्य समिति के लिए जवाहरलाल नेहरू, मूल अधिकार अल्पसंख्यक अधिकार आदि की सलाहकार समिति के लिए वल्लभभाई पटेल को अध्यक्ष बनाया गया था।
मूल अधिकार अल्पसंख्यक अधिकार आदि की सलाहकार समिति की चार उप समितियां भी बनाई गई थीं। जिनमें अल्पसंख्यक उप समिति के अध्यक्ष एच.सी. मुखर्जी बनाए गए थे। जबकि मूल अधिकार उप समिति के लिए जे.बी. कृपलानी, पूर्वोत्तर सीमा जनजाति क्षेत्र और आसाम आदि की उप समिति के लिए गोपीनाथ बरदोलाई ,अपवर्जित और भागत अपवर्जित क्षेत्र समिति के लिए जे.जे. निकोलस राय को अध्यक्ष बनाया गया था।
उपरोक्त के अतिरिक्त संघ शक्ति समिति और संघ संविधान समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू , उच्चतम न्यायालय के लिए तदर्थ समिति के अध्यक्ष एस.वरदाचारी, प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल, मुख्य आयुक्त प्रांत समिति के अध्यक्ष डॉ पट्टाभि सीतारमैया , प्रारूपण समिति के अध्यक्ष डॉ भीमराव अंबेडकर, संघ के संविधान के वित्तीय उपबंधों के लिए विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष नलिनीरंजन सरकार और भाषावार प्रांत आयोग के अध्यक्ष एस. के. दर बनाए गए थे। इन सभी समितियों के अध्यक्षों का कार्य तत्संबंधी विभिन्न देशों की संवैधानिक व्यवस्थाओं का अध्ययन करना था और यह देखना था कि किस देश की किस व्यवस्था को अपने संविधान में स्थापित किया जा सकता है ?
संविधान सभा का गठन
यदि हम भारतीय संविधान सभा के गठन और उसकी कार्यप्रणाली से संबंधित तथ्यों का अवलोकन करें तो पता चलता है कि कैबिनेट मिशन की संस्तुतियों के आधार पर भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन जुलाई 1946 में किया गया । संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी, जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि एवं 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे । मिशन योजना के अनुसार जुलाई 1946 ई० में संविधान सभा का चुनाव हुआ। कुल 389 सदस्यों में से प्रांतों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों के लिये चुनाव हुए । इसमें कांग्रेस को 208, मुस्लिम लीग को 73 स्थान एवं 15 अन्य दलों के तथा स्वतंत्र उम्मीदवार निर्वाचित हुए । इस संविधान सभा का चुनाव उस समय के अखंड भारत से किया गया था। जिसका उद्देश्य तत्कालीन संपूर्ण भारत के लिए संविधान बनाना था। यद्यपि जब संविधान सभा का विधिवत्त शुभारंभ हुआ तो पाकिस्तान के लिए जिद करने वाली मुस्लिम लीग इस संविधान सभा का बहिष्कार कर गई।
9 दिसंबर, 1946 ई० को संविधान सभा की प्रथम बैठक नई दिल्ली स्थित काउंसिल चैम्बर के पुस्तकालय भवन में हुई । सभा के सबसे वरिष्ठ और वयोवृद्ध सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को भारत की इस संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुना गया ।
संविधान सभा में ब्रिटिश प्रान्तों के 296 प्रतिनिधियों का विभाजन बौद्धिक क्षमताओं के आधार पर न करके सांप्रदायिक आधार पर किया गया। जो इस प्रकार था - 213 सामान्य, 79 मुसलमान तथा 4 सिख। यद्यपि संविधान निर्माण का कार्य बौद्धिक क्षमता सम्पन्न लोगों को ही दिया जाना चाहिए था, परंतु इसमें भी आरक्षण की व्यवस्था की गई। जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। क्या ही अच्छा होता कि समदर्शी दृष्टिकोण के लोगों को संविधान सभा का सदस्य मनोनीत किया जाता ? उनके लिए अनिवार्य किया जाता कि वह किसी भी स्थिति में पक्षपाती नहीं बनेंगे और न ही किसी वर्ग या समाज के साथ अन्याय करने की नीतियों का समर्थन करेंगे। संविधान सभा को विद्वानों की सभा बनाना चाहिए था। उसमें आरक्षण की आवश्यकता नहीं थी।
(लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता है)
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