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राष्ट्र का सांझा कार्यक्रम और वंदे मातरम

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय १५

राष्ट्र का सांझा कार्यक्रम और वंदे मातरम

डॉ राकेश कुमार आर्य
भारत के अधिकांश मुसलमानों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए फेसबुक पर डॉ सलमान अरशद नाम के एक सज्जन " वंदेमातरम और तौहीद : इतिहास, सियासत और आज की ज़रूरत" नामक शीर्षक से ' वंदे मातरम' के विषय में लिखते हैं कि ' वंदे मातरम' एक समय की हमारी आवश्यकता थी, परंतु आज यह हमारी आवश्यकता नहीं रहा है। पराधीनता के काल में राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता थी, जिसे किसी सीमा तक ' वंदे मातरम' मजबूत करता था। आज परिवर्तित परिस्थितियों और परिवर्तित संदर्भ में इसके साथ जुड़े रहना या इसको अपने साथ जोड़े रखना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।
हर मुस्लिम की भांति उनका मानना है कि " हर दौर की अपनी ज़रूरतें होती हैं, और उन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पैदा होने वाले विचार भी उसी दौर की उपज होते हैं। उनके साथ विकसित होने वाले औज़ार और प्रतीक भी अपने समय की ज़मीन से जुड़कर अर्थ पाते हैं। लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि वही प्रतीक, वही विचार या वही औज़ार किसी दूसरे दौर में भी उतने ही मानीख़ेज़ या ज़रूरी बने रहें।"


'वंदे मातरम' की वास्तविकता और मुस्लिम



ये लेखक महोदय इस बात को भूल जाते हैं कि सनातन एक प्रवाहमान सरिता है। इसके मूल्य हर काल में शाश्वत और सनातन होते हैं, अमिट होते हैं। कुछ चीजें निश्चित रूप से ऐसी होती हैं कि जो पानी के बुलबुले की भांति ऊपर आती हैं और अपने आप मिट जाती हैं। जहां तक ' वंदे मातरम ' की बात है तो यह सृष्टि के प्रारंभ में मातृभूमि की वंदना को लेकर वेद के माध्यम से प्रकट हुआ। निश्चित रूप से उस समय इसका नामकरण ' वंदे मातरम' के रूप में नहीं हुआ था, परंतु वेद के 'पुरुष सूक्त' और 'भूमि सूक्त' में जिन वेदमंत्रों का विधान किया गया है, वे हमें अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पित होने की शिक्षा देते हैं। ' वंदे मातरम' का अभिप्राय मातृभूमि को उस परमपिता परमेश्वर के समतुल्य मानना नहीं है, जिसने इस सृष्टि की रचना की है। इसका अभिप्राय मात्र अपनी उस मातृभूमि के प्रति समर्पण व्यक्त करना है,जिसका दिया हम अन्न खाते हैं और जिस पर बहने वाली नदियों का पानी पीते हैं। जो हमारे सारे नाज नखरे उसी प्रकार झेलती है जिस प्रकार हमारी जननी हमारे नाज नखरे झेलती है।

हिंदू धार्मिक होता है सांप्रदायिक नहीं



कोई भी हिंदू सांप्रदायिक नहीं होता। उसे सांप्रदायिक वे लोग बनाते हैं जो स्वयं सांप्रदायिक होते हैं। भारत में लोग धार्मिक होते हैं और धार्मिक वह व्यक्ति होता है जो प्रत्येक व्यक्ति के दुख दर्द में सम्मिलित होना अपना नैतिक कर्तव्य मानता है। सांप्रदायिक होना अलग बात है और धार्मिक होना अलग बात है। धार्मिकता को आप सांप्रदायिकता के समतुल्य नहीं मान सकते। जब सांप्रदायिकता धार्मिकता को धमकाने लगती है, तब धार्मिक लोग अपनी धार्मिकता पर डटे रहने का प्रयास करते देखे जाते हैं। वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं । क्योंकि वह भली प्रकार यह जानते हैं कि यदि अस्तित्व के लिए संघर्ष नहीं किया जाएगा तो वह मिट जाएंगे। इसी को सांप्रदायिक लोग उन धार्मिक लोगों की सांप्रदायिकता कहने लगते हैं।
धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदार तुष्टिकरण का खेल खेलते हुए सांप्रदायिक लोगों की पीठ थपथपाकर धार्मिक लोगों को भी सांप्रदायिक लोगों के बराबर लाकर खड़ा कर देते हैं। इसी कारण जब कहीं सांप्रदायिक दंगे होते हैं तो इन्हीं धर्मनिरपेक्ष लोगों की मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण गलती करने वाले और गलती सहने वाले दोनों पक्षों को पुलिस उठाकर थाने में बंद कर देती है या दोनों पर समान धाराएं लगाकर केस दर्ज कर देती है। यह प्रक्रिया पूर्णतया गलत है। किसी भी ऐसी विषम परिस्थिति में गलती करने वाला कोई एक ही पक्ष होता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समाज में एक पक्ष शोषक होता है तो दूसरा शासित होता है। जैसे शोषक और शासित में मौलिक अंतर है, वैसे ही हिंदू और मुस्लिम में भी मौलिक अंतर है। जिसे हमें समझने की आवश्यकता है।
अरशद आगे लिखते हैं -" ' वंदेमातरम' भी इसी तरह का एक प्रतीक है। इसमें कोई शक नहीं कि आज़ादी के आंदोलन के दौरान यह गीत दीवानावार गाया गया। इस गीत ने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जद्दोजहद करने वालों को जोश, जुनून और कुर्बानी का हौसला दिया। लेकिन सवाल यह है कि — क्या आज भी इस गीत की वही भूमिका, वही ज़रूरत या इस गीत में वही आत्मा मौजूद है ?"


वंदे मातरम की प्रासंगिकता



इस पर हमारा कहना है कि ' वंदे मातरम' ने जहां देश विरोधी शक्तियों का सामना करने के लिए हमारे भीतर राष्ट्रीय एकता का भाव पराधीनता के काल में उत्पन्न करने का महत्वपूर्ण कार्य किया, वहीं आज भी इसकी प्रासंगिकता हमारे लिए निरंतर बनी हुई है। क्योंकि मां भारती के लिए जहां अंग्रेजों के शासनकाल में विभिन्न प्रकार के खतरा थे, उसी प्रकार के खतरे आज भी चारों ओर मंडरा रहे हैं। परिस्थितियों में थोड़ा-थोड़ा अंतर आया है। यदि उस समय गोरे अंग्रेज हम पर शासन कर भारत और भारतीयता की हत्या कर रहे थे, उन्हें मिटाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे तो उनके जाने के पश्चात कुछ ' काले अंग्रेजों ' ने उनकी इस परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य निरंतर जारी रखा हुआ है। वेद के लिए उस समय भी संकट था, आज भी संकट है। उपनिषद, दर्शन,रामायण, महाभारत, गीता, आदि के लिए उस समय भी संकट था ,आज भी संकट है । भारतीय संस्कारों के लिए उस समय भी संकट था आज भी संकट है । भारतीय भाषा के लिए उस समय भी संकट था, आज भी संकट है। तब हमें ' वंदे मातरम' बताता है कि हमारे लिए आज भी संघर्ष का काल है अर्थात अभी दूसरी स्वाधीनता मिलना शेष है और जिस दिन यह दूसरी स्वाधीनता हमको मिलेगी वास्तव में माना जाएगा कि हम उसी दिन स्वाधीन होंगे।

अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना होगा


स्वभाषा, स्वसंस्कृति, स्वधर्म , स्वदेश, स्वराष्ट्र के लिए संघर्ष करना यदि हिंदू की सांप्रदायिकता है तो यह सांप्रदायिकता हिंदू समाज स्वीकार करता है। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इस प्रकार के भाव प्रत्येक देशवासी के भीतर होने ही चाहिए। राष्ट्रवाद की इस पवित्र भावना को सांप्रदायिकता कहकर हिंदू को हीन करने का प्रयास किया जाता है। यदि भारत के मुसलमानों के लिए अपनी भाषा, अपना वेष, अपनी धार्मिक पुस्तक आदि पूजनीय हैं तो हिंदू समाज का भी अपना अधिकार है कि वह अपनी निजता, अपनी अस्मिता और अपनी पहचान को बनाए रखने के प्रति सचेत हो। यह नहीं हो सकता कि अपनी पहचान को मिटा कर दूसरे की पहचान ओढ़ ली जाए और निज अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया जाए। ' वंदे मातरम' हमें अपने अस्तित्व के लिए एकता के सूत्र में बांधने की क्षमता रखता है। इस गीत की प्रासंगिकता आज भी है। जिन लोगों को भारतीयता से प्रेम नहीं है, भारत की सामाजिक एकता में जिनका विश्वास नहीं है और जो भारत के राष्ट्रीय स्वरूप को गंदला करने के प्रयासों में लगे रहते हैं, उनके लिए ' वंदे मातरम' अछूत हो सकता है। वास्तव में ' वंदे मातरम' को उनके द्वारा इस प्रकार अछूत मानना ही उनकी राष्ट्रभक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

इस्लाम और वेद का एकेश्वरवाद

उपरोक्त लेखक का मानना है कि '' आज़ादी के बाद इस गीत के अर्थ और उपयोग दोनों बदल गए। एक वक़्त आया जब मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व ने इस गीत में छिपी “ मातृभूमि की वंदना” को इस्लामी तौहीद के ख़िलाफ़ बताया। तौहीद का अर्थ है — अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत न करना, किसी और को पूज्य या दैवी शक्ति के रूप में न मानना। इस लिहाज़ से वंदेमातरम का वह हिस्सा, जिसमें मातृभूमि को देवी रूप में प्रणाम किया गया है, इस्लामी नज़रिए से इबादत का दायरा पार करता है। इसलिए इसे नकारा गया।"
इस्लाम के इस प्रकार के विचारों के बारे में हमें यह बताने में कोई संकोच नहीं कि तौहीद अर्थात एकेश्वरवाद का विचार इस्लाम ने भारत के वेद से लिया है अर्थात एकेश्वरवाद का विचार इस्लाम ने हमें दिया नहीं है, इसके विपरीत उसने हमसे लिया है। वेद का स्पष्ट मानना है कि परमपिता परमेश्वर तो ' एक' ही है। परंतु विप्र अर्थात विद्वान लोग उसे उसके गुण ,कर्म, स्वभाव के अनुसार अनेक नामों से पुकारते हैं। स्वामी दयानंद जी महाराज एकेश्वरवाद के वैदिक सिद्धांत को लागू करने पर बल देते थे । उन्होंने स्पष्ट किया था कि 'ओ३म' परमपिता परमेश्वर का निज नाम है। इसके उपरांत भी स्वामी जी महाराज ने " सत्यार्थ प्रकाश " के प्रथम समुल्लास में ईश्वर के सौ नामों की व्याख्या की है। जिन पर लेखक की भी एक पुस्तक काव्यात्मक शैली में डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है। जिसका नाम " ईश्वर के 100 नामों की काव्यात्मक व्याख्या " है। इस्लाम सहित संसार के प्रत्येक मजहब के मानने वालों ने स्वामी दयानंद जी को पढ़ना भी सांप्रदायिक माना है। यदि ये लोग स्वामी जी की मान्यताओं को पढ़ें और समझें तो इनका वैदिक धर्म के बारे में पूर्वाग्रह समाप्त हो सकता है। माना कि भारतवर्ष में कुछ लोगों ने अज्ञानतावश और अविद्या अंधकार के कारण ईश्वर के अनेक नामों के अर्थ न समझकर अनेक ईश्वरों की कल्पना कर ली। परंतु यह वैदिक और सनातन सिद्धांत नहीं है। विकार प्रत्येक समाज में आना संभव है। इसलिए हिंदू समाज की इस प्रकार की मान्यताओं को मात्र विकार मानना चाहिए। वास्तविक स्वरूप में सारा सनातन एकेश्वरवाद पर आधारित है।

मातृभूमि की देवी रूप में वंदना

हम पूर्व में ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि मातृभूमि देवी इस रूप में है कि वह हमारा पालन पोषण वृद्धि और विकास करने में सहयोग करती है। जिसके भीतर हमें कुछ देने की क्षमता होती है - वही हमारे लिए देव बन जाता है। परंतु देव का अर्थ परमपिता परमेश्वर नहीं है। संसार में वह व्यक्ति भी हमारे लिए देव हो सकता है जो हमारे जीवन निर्माण में सहयोग कर रहा है इस दृष्टि से माता-पिता और गुरु हमारे यहां पर चेतन देव के रूप में स्वीकार किए गए हैं। जबकि प्राकृतिक शक्तियों को जड़ देवता के रूप में स्थान दिया गया है। इन सब के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हम सबका कर्तव्य है।
इस्लाम को मानने वाले लोगों को वंदे मातरम का सही अर्थ समझने के लिए भारत के सनातन मूल्यों के बारे में जानकारी लेनी होगी। जिसमें दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का विशेष सम्मान व्यक्त किया गया है। प्रचलित अर्थों में इसका अर्थ लेना अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करना है। दुर्गा राष्ट्र की क्षत्रिय शक्ति का नाम है , जो शस्त्रधारी होकर राष्ट्र की रक्षा करता है। इसलिए राष्ट्र की दुर्गा शक्ति के प्रति समर्पण करना राष्ट्रवासियों का दायित्व है। कर्तव्य है। दुर्गा शक्ति के प्रति समर्पण का अर्थ है कि हम क्षत्रिय लोगों का सम्मान करते हैं। जिनके बिना राष्ट्र रक्षित नहीं हो सकता। क्योंकि वे हमारे राष्ट्र की अपने शस्त्रों से रक्षा करते हैं। इसका अभिप्राय यह भी है कि हम निरंतर क्षत्रिय शक्ति का विस्तार और विकास करते रहेंगे, जिससे कि हमारा राष्ट्र सदैव सुरक्षित रहे। किसी की पूजा करने का अभिप्राय गुण - अभिनंदन ही नहीं है अपितु गुणवर्धन भी है। इसका अर्थ यह भी है कि हमारे युवा सोएंगे नहीं, वे निरंतर अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए जागरूक रहेंगे।
" लक्ष्मी " राष्ट्र की वैश्य शक्ति का प्रतीक है अर्थात राष्ट्र के वैश्य समाज के लिए अर्थात उस समाज के लिए जो अन्न ,धन उत्पन्न कर राष्ट्र रक्षा में अपना सहयोग करता है, कृतज्ञता ज्ञापित करना भी राष्ट्र वासियों का पवित्र कर्तव्य है। इसी प्रकार सरस्वती विद्यावान , विद्वान, तपस्वी, धार्मिक लोगों के लिए समझना चाहिए। ये लोग बौद्धिक बल से राष्ट्र की रक्षा करते हैं। उसकी उन्नति में सहायक होते हैं। इन तीन से अलग संसार में कोई चौथी ऐसी शक्ति नहीं है जो राष्ट्र की किसी प्रकार से सेवा करती हो। इन तीनों का विशेष महत्व है। इन्हीं को हम ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का उल्लेख करके शूद्र वर्ण का उल्लेख न करने का अभिप्राय यह नहीं है कि उसका कोई योगदान राष्ट्र निर्माण में नहीं है। राष्ट्र निर्माण में उसका भी योगदान है और वह सेवाभाव से अपने राष्ट्र की रक्षा करता है । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य उसके शत्रु नहीं हैं। इसके विपरीत वे उसके अधिकारों के संरक्षक बनकर उसकी रक्षा करते हैं और उसे जीवन जीने के लिए समान अवसर प्रदान करते हैं। एक प्रकार से ये तीनों मिलकर शूद्र वर्ण के लिए उन्नति और विकास के अवसर उपलब्ध कराते हैं। यह भारत का सनातन स्वरूप है। इसे पौराणिक दृष्टिकोण से समझना मूर्खता है। क्योंकि पौराणिक दृष्टिकोण में कई प्रकार के दोष हो सकते हैं ,परंतु वैदिक दृष्टिकोण में कोई दोष होना संभव नहीं है।

सनातन पर अनर्गल आरोप

सनातन के इन मूल्यों को सही स्वरूप में न तो स्थापित होने दिया गया और न ही इन्हें सही स्वरूप में लागू होने दिया गया। बस, केवल यह शोर मचाया गया कि हिंदू समाज में एक जाति दूसरी जाति का शोषण करती है। वेद की शिक्षाओं को उनके तात्विक स्वरूप में विद्यालयों में पढ़ाने से यह कहकर रोकने का प्रयास किया गया कि ये सारी मान्यताएं जंग लगी हुई व्यवस्था है। जिसका अब कोई औचित्य नहीं है। इसी बात को घुमा फिरा कर फेसबुक पर उपरोक्त लेखक कह रहे हैं। यह उनकी अकेले की मान्यता नहीं है, उनका लेख उन अनेक लोगों की सामूहिक मान्यता को स्पष्ट करता है जो सनातन के बारे में इसी प्रकार की सोच रखते हैं।
उपरोक्त लेखक आगे लिखते हैं कि " इसकी प्रतिक्रिया में हिन्दू साम्प्रदायिक ताक़तों ने इस गीत को जैसे अपनी धार्मिक पहचान का प्रतीक बना लिया। उन्होंने इसे “राष्ट्रीय निष्ठा” का पैमाना ठहरा दिया — यानी जो वंदेमातरम नहीं कहेगा, वह देशद्रोही है।"
हम पूर्व में ही है स्पष्ट कर चुके हैं कि अपने राष्ट्र के मूल्यों के प्रति समर्पित रहना और उन्हें अपनी पहचान के साथ जोड़ना यदि सांप्रदायिकता है तो हिंदू समाज को यह सांप्रदायिकता स्वीकार है। हमारे यहां पर ' शब्द ब्रह्म ' माना गया है। शब्द में ब्रह्म की शक्ति होती है। वह विधेयात्मक होता है। शब्द निर्माणात्मक और सृजनात्मक होता है। उसकी इन शक्तियों का बहुत महत्वपूर्ण प्रभाव होता है। जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। ' वंदे मातरम' ने हमारे भीतर जिन शक्तियों का संचार किया उन शक्तियों को हम शाश्वत सनातन मानकर सहेजना चाहते हैं । जिससे हमारे राष्ट्र के विखंडन की योजना बनाने वाली शक्तियों का स्वयं का ही विखंडन होता रहे। यह नहीं चल सकता कि हिंदू समाज को इस्लाम या ईसाई मत को मानने वाले लोग जाति, भाषा के आधार पर तोड़ने का कार्य करते रहें और हम शांत रहें। यदि उनकी सोच आज भी भारतीय राष्ट्र का विखंडन करने की है तो हमारी सोच अपनी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने की होनी ही चाहिए। यदि इस सोच को ' वंदे मातरम' मजबूत करने में काम आ सकता है तो हमें इसे अपने राष्ट्र का एक संस्कार बना लेना चाहिए। यदि इस्लाम और ईसाई मत को मानने वाले लोग अपनी विखंडनात्मक ( इसी को उनका देशद्रोह मानना चाहिए ) सोच से बाज नहीं आ रहे हैं अर्थात वे हिंदू समाज को तोड़कर या कमजोर करके मिटा देने की गतिविधियों में निरंतर लगे हुए हैं तो हिंदू समाज को सावधान रहना ही होगा। यदि उनमें बदलाव नहीं है तो हिंदू समाज में कौन से बदलाव की अपेक्षा की जा रही है ?

भारत में राष्ट्र ,राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता

अरशद आगे लिखते हैं " हालाँकि इतिहास का सच यह है कि हिन्दू सम्प्रदायिक समूह ने इस गीत से कोई प्रेरणा लेकर आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी। अगर कुछ मुसलमानों ने इसे तौहीद के ख़िलाफ़ बताकर इसका विरोध न किया होता, तो सम्भव है कि हिन्दू संगठन भी इसे बहुत पहले भूल चुके होते।"
लेखक की यह मान्यता उसकी इतिहास संबंधी अज्ञानता को प्रकट करती है। यह कुछ उसी प्रकार से है जिस प्रकार यह कह दिया जाता है कि भारत में तो राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का विचार कभी रहा ही नहीं है। जबकि भारत ही वह देश है- जिसने राष्ट्र, राष्ट्रीय और राष्ट्रवाद का चिंतन सारे विश्व को दिया है। संसार को लोकतंत्र का विचार भारत ने दिया है। लोकतंत्र के सिद्धांतों की रक्षा भारत ने की है। अरशद जैसे लोगों को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि इस्लाम ने संसार को कट्टरता के अतिरिक्त कुछ नहीं दिया। उसने रक्तपात किया है और रक्तपात कर करोड़ों लोगों की हत्याएं की हैं। जबकि हिंदू समाज ने राष्ट्रवाद के वास्तविक प्रसारक के रूप में प्राचीन काल से ही संसार को सृजनात्मक विचारों से सिंचित किया है।
'वंदे मातरम' को गाकर हमारे यहां पर हजारों- लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना बलिदान दिया है। बड़े-बड़े जुलूसों में इसका सामूहिक गान और इसका जयघोष लोगों में उत्साह का संचार करता था। जिन लोगों ने इस गीत का विरोध किया था, वे तौहीद ( राष्ट्र के संबंध में ' एक राष्ट्र' ) में विश्वास रखने वाले न होकर द्विराष्ट्रवाद ( बहुदेवतावादी अथवा एक से अधिक राष्ट्र मानने वाले ) के समर्थक थे। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का वे जानबूझकर शिकार बने थे। क्योंकि ' वंदे मातरम ' का विरोध करने वाले मुसलमानों का उद्देश्य अपने लिए एक अलग राष्ट्र की मांग करना था। जिसे वह अंग्रेजों के सहयोग से प्राप्त कर लेना चाहते थे।


वंदे मातरम का ऐतिहासिक महत्व

डॉ अरशद का कहना है कि " आज यह गीत अपने ऐतिहासिक संदर्भ से कटकर सिर्फ़ सियासी हथियार बन गया है। अब इसे राष्ट्रीय एकता या प्रेरणा के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि पहचान की लड़ाई के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। जो लोग इसे गाने पर ज़ोर देते हैं, वे दरअसल इसे “ हम बनाम वे ” की रेखा खींचने के लिए इस्तेमाल करते हैं।"
हमारा मानना है कि यह गीत हमारे लिए जितना ऐतिहासिक संदर्भ में आवश्यक और प्रेरणास्पद है, उतना ही हमारे लिए वर्तमान समय में राजनीति के लिए इसका प्रेरक तत्व हो जाना भी आवश्यक है। जो लोग धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू विरोध की बात करते हैं अथवा इस प्रकार की राजनीति करते हैं, वास्तव में वही लोग भारत विरोधी होते हैं।
हिंदू विरोध का अभिप्राय राष्ट्र विरोध से है। क्योंकि हिंदुत्व अपने आप में एक जीवन शैली है। यह हमारे राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है, जैसा कि महाराष्ट्र के पूर्व चीफ जस्टिस मोहम्मद करीम छागला ने इसके बारे में स्पष्ट किया था। यहां तक कि मोहम्मद इकबाल भी" हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदुस्तान हमारा " में "हिंदी" का अभिप्राय हिंदुस्तान के रहने वाले लोगों से लेते हैं। अरब में आज तक भी लोग हिंदुस्तान से जाने वाले मुसलमानों को "हिंदी" कहकर बुलाते हैं। यह हिंदुत्व अर्थात वैदिक सत्य सनातन धर्म की शैली ही है , जो प्रत्येक मुसलमान को उसके धार्मिक अधिकार प्रदान कर सकती है। इस्लाम की " शरीयत " ऐसा कदापि नहीं कर सकती कि वह लागू हो जाए और लागू होने के उपरांत भी हिंदुओं को उनके धार्मिक अधिकार प्रदान करने की उदारता दिखा सके। ' वंदे मातरम' अपने आप में हिंदुत्व की जीवन शैली का उद्घोषक और प्रेरक नारा है। जिसे न केवल राष्ट्र को स्वीकार करना चाहिए बल्कि राजनीति को भी स्वीकार करना चाहिए। ' वंदे मातरम' हमको वास्तविक सेकुलर बनाता है।
अंत में अपना निष्कर्ष निकालते हुए डॉ अरशद लिखते हैं कि " इसलिए सवाल यह नहीं कि वंदेमातरम को गाया जाए या नहीं — बल्कि यह है कि क्या आज इस गीत की वैसी कोई भूमिका बची है जैसी एक सदी पहले थी ? मेरे विचार में, इस गीत का ऐतिहासिक महत्व अपनी जगह कायम है, लेकिन आज के दौर में इसकी वर्तमान भूमिका या ज़रूरत नहीं रह गई है। अब इसका ज़िक्र, इसका गायन, और इसके इर्दगिर्द की बहसें ज़्यादातर साम्प्रदायिक उपयोगिता से प्रेरित हैं, न कि किसी राष्ट्रीय भावना या इंसानी एकता से।"
कितनी मिठास के साथ डॉ अरशद ने वर्तमान संदर्भ में वंदे मातरम की भूमिका को नकार दिया है ? यही वह मिठास है जो हिंदुओं को अक्सर पीने के लिए दी जाती रहती है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उन पर दबाव बनाया जाता है कि इसे स्वीकार कर लिया जाए। एक शताब्दी पहले भी इसी मिठास के साथ वंदे मातरम का विरोध हो रहा था और आज भी इसी प्रकार की बातें करके वंदे मातरम को नकारने का प्रयास किया जा रहा है। डॉ अरशद भारत की धार्मिक मान्यताओं से अनभिज्ञ हैं। वे धार्मिकता को ही सांप्रदायिकता मानते हैं। इसलिए उनको वंदे मातरम में सांप्रदायिकता दिखाई देती है।
वर्तमान में हमको आंखें खोल कर चलने की आवश्यकता है। किसी का अहित नहीं होना चाहिए, यह अपनी जगह पर है परन्तु कोई राष्ट्र का ही अहित करने की ठान ले यह भी नहीं हो सकता। निश्चित रूप से राष्ट्र का निर्माण सामूहिक भावनाओं के सम्मान से होता है तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि बहुसंख्यक समाज की मान्यताओं को कूड़ेदान में फेंक दिया जाए और उन थोथी और खोखली मान्यताओं को स्थापित कर लिया जाए जिनसे राष्ट्र विघटित होता है। राष्ट्र के संचालन के लिए हमें अपना कॉमन मिनिमम एजेंडा अर्थात सामूहिक सांझा कार्यक्रम तैयार करना ही पड़ेगा और उसमें वंदे मातरम की भूमिका निश्चित रूप से सराहनीय हो सकती है।



( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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