महाशिवरात्रि का धर्मशास्त्र

श्रीमती प्राची जुवेकर
परिपूर्ण पवित्रता, परिपूर्ण ज्ञान, परिपूर्ण साधना ये तीनों गुण जिनमें विद्यमान हैँ, वे महादेव हैं । 15 फरवरी के दिन महाशिवरात्रि है । इस विशेष प्रवचन में हम महाशिवरात्रि के व्रत एवं भगवान शिव की उपासना में की जानेवाली कृतियों का शास्त्र समझेंगे । किसी देवता के सदंर्भ में हम अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान समझ पाए तो उस देवता के विषय में हमारी श्रद्धा बढ़ती है तथा उनकी उपासना भावपूर्ण करने में सहायता होती हैं । भावपूर्ण उपासना अधिक फलदायी होती है ।
महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की इस तिथि के दिन करते हैं । यह भगवान शिवजी का व्रत है । भगवान शिव सहजता से प्रसन्न होने वाले देवता हैं । इस कारण पृथ्वीतल पर शिवजी के भक्त विशाल संख्या में हैं। महाशिवरात्रि के दिन शिवतत्व अन्य दिनों की तुलना में १००० गुना अधिक कार्यरत रहता है । शिवतत्व का अधिकाधिक लाभ लेने के लिए महाशिवरात्रि को शिव की भावपूर्ण पद्धति से पूजा अर्चना करने के साथ ‘ॐ नमः शिवाय ।’ यह नामजप अधिकाधिक करें ।
महाशिवरात्रि का महत्त्व क्या है ?
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव जितना समय विश्राम करते हैं, उस काल को ‘प्रदोष’ अथवा ‘निषिथकाल’ कहते है । पृथ्वी का एक वर्ष स्वर्गलोक का एक दिन होता है । पृथ्वी स्थूल है । स्थूल की गति अल्प होती है अर्थात स्थूल को ब्रह्मांड में यात्रा करने के लिए अधिक समय लगता है । देवता सूक्ष्म होते हैं, इसलिए उनकी गति अधिक होती है । यही कारण है कि, पृथ्वी एवं देवताओं के कालमान में एक वर्ष का अंतर होता है । पृथ्वी पर यह काल सर्वसामान्यतः एक से डेढ घंटे का होता है । इस समय भगवान शिव ध्यानावस्था से समाधि-अवस्था में जाते हैं । इस काल में किसा भी मार्ग से, ज्ञान न होते हुए, जाने-अनजाने में उपासना होने पर भी अथवा उपासना में कोई दोष अथवा त्रुटी भी रह जाए, तो भी उपासना का १०० प्रतिशत लाभ होता है । इस दिन शिव-तत्त्व अन्य दिनोंकी तुलना में एक सहस्र गुना अधिक कार्यरत होता है । इस दिन की गई भगवान शिव की उपासना से शिव-तत्त्व अधिक मात्रा में ग्रहण होता है । शिव-तत्त्व के कारण अनिष्ट शक्तियों से हमारी रक्षा होती है ।
महाशिवरात्रि व्रत विधि कैसे करें ?
संपूर्ण देश में महाशिवरात्रि बडे उत्साह से मनाई जाती है । फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को भगवान शिव का महाशिवरात्रि व्रत करते हैं । उपवास, पूजा और जागरण महाशिवरात्रि व्रत के ३ अंग हैं । ‘फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को एक समय उपवास करें । चतुर्दशी को सवेरे महाशिवरात्रि व्रत का संकल्प करें । सायंकाल नदी अथवा तालाब के किनारे जाकर शास्त्रोक्त स्नान करें । भस्म और रुद्राक्ष धारण करें । प्रदोषकाल पर शिवजी के देवालय में जाकर भगवान शिव का ध्यान करें । तत्पश्चात षोडशोपचार पूजन करें । भवभवानीप्रित्यर्थ तर्पण करें । भगवान शिव को एक सौ आठ कमल अथवा बिल्वपत्र नाममंत्र सहित चढाएं । तत्पश्चात पुष्पांजली अर्पण कर अर्घ्य दें । पूजासमर्पण, स्तोत्रपाठ और मूलमंत्र का जप होने के उपरांत भगवान शिव के मस्तक पर चढाया हुआ एक फूल उठाकर स्वयं के मस्तक पर रखें और क्षमायाचना करें’, ऐसा महाशिवरात्रि का व्रत है ।
शिवपिंडी का अभिषेक करें
महाशिवरात्रि पर कार्यरत शिव-तत्त्व का अधिकाधिक लाभ लेने हेतु शिवभक्त शिवपिंडी पर अभिषेक करते है ।
शिवपिंडी को हलदी-कुमकुम की अपेक्षा भस्म लगाएं
किसी भी देवतापूजन में मूर्ति को स्नान कराने के उपरांत हलदी-कुमकुम चढाया जाता है । परंतु शिवजी की पिंडी की पूजा में हलदी एवं कुमकुम निषिद्ध माना गया है । हल्दी मिट्टी में उगती है । यह उत्पत्ति का प्रतीक है । कुमकुम भी हल्दी से ही बनाया जाता है, इसलिए वह भी उत्पत्ति का ही प्रतीक है । शिवजी ‘लय’ के देवता हैं, इसीलिए ‘उत्पत्ति’ के प्रतीक हल्दी-कुमकुम का प्रयोग शिव पूजन में नहीं किया जाता । शिवपिंडी पर भस्म लगाते हैं, क्योंकि वह लय का प्रतीक है । पिंडी के दर्शनीय भाग से भस्म की तीन समांतर धारियां बनाते हैं । उन पर मध्य में एक वृत्त बनाते हैं, जिसे शिवाक्ष कहते हैं ।
शिव पूजन करते समय शिवपिंडी पर श्वेत अक्षत अर्पण करें - श्वेत अक्षत वैराग्य के, अर्थात निष्काम साधना के द्योतक हैं ।
भगवान शिव को श्वेत पुष्प अर्पण करें - भगवान शिव को श्वेत रंग के पुष्प ही चढाएं । उनमें रजनीगंधा, जाही, जुही एवं बेला के पुष्प अवश्य हों । ये पुष्प दस अथवा दस की गुना में हों । तथा इन पुष्पोंको चढाते समय उनका डंठल शिवजी की ओर रखकर चढाएं । पुष्पोंमें धतूरा, श्वेत कमल, श्वेत कनेर, आदि पुष्पों का चयन भी कर सकते हैं ।
भगवान शिव का प्रिय बेल पत्र चढाएं : इस कालावधि में शिव-तत्त्व अधिक से अधिक आकृष्ट करनेवाले बेल पत्र, श्वेत पुष्प इत्यादि शिवपिंडी पर चढाए जाते हैं । बेल पत्र से वातावरण में विद्यमान शिव-तत्त्व आकृष्ट किया जाता है । भगवान शिव के नाम का जाप करते हुए अथवा उनका एक-एक नाम लेते हुए शिवपिंडी पर बेल पत्र अर्पण करने को बिल्वार्चन कहते हैं । इस विधि में शिवपिंडी को बेल पत्रोंसे संपूर्ण आच्छादित करते हैं ।
शिवपिंडी पर बेल पत्र कैसे चढाए तथा बेल पत्र तोडने के नियम
बेल के वृक्ष में देवता निवास करते हैं । इस कारण बेल वृक्ष के प्रति कृतज्ञता का भाव रख कर उससे मन ही मन प्रार्थना करने के उपरांत उससे बेल पत्र तोडना आरंभ करना चाहिए । शिवपिंडी की पूजा के समय बेल पत्र को औंधे रख एवं उसके डंठल को अपनी ओर कर पिंडी पर चढाते हैं । शिवपिंडी पर बेल पत्र को औंधे चढाने से उससे निर्गुण स्तर के स्पंदन अधिक प्रक्षेपित होते हैं । इसलिए बेल पत्र से श्रद्धालु को अधिक लाभ मिलता है ।
महाशिवरात्रि के दिन शिवजी के लिए कौनसे गंध की अगरबत्ती जलाएं ?
शिवजी को अगरबत्ती दिखाते समय तारक उपासना के लिए चमेली एवं हीना गंधोंकी अगरबत्तियोंका उपयोग किया जाता है तथा इन्ही सुगंधोंका इत्र अर्पण करते है । परंतु महाशिवरात्रि के पर्व पर शिवजी को केवडे के सुगंधवाला इत्र एवं अगरबत्ती का उपयोग बताया गया है ।
भगवान शिव के मंदिर में ऐसे करें शिवपिंडी के दर्शन !
शिवालयमें प्रवेश करते ही हमें पहले दर्शन होते हैं, नंदीके । शिवजीके दर्शनसे पूर्व नंदीके दर्शन किए जाते हैं । उसके उपरांत शृंगदर्शन अर्थात नंदीके सींगोंके बीच से शिवपिंडी के दर्शन किए जाते हैं । वृषभरूपमें नंदी शिवजीका वाहन है । नंदी शिवजीके सामने लीनभावसे बैठे रहते हैं । वह शिवजीका परमभक्त हैं । उससे हमें लीनतासे ईश्वरके चरणोंमें पडे रहनेकी सीख मिलती है । शिवजी के मंदिरमें प्रवेश करनेपर प्रथम नंदीके दर्शन करनेसे हममें भी लीनता निर्माण होती है ।
भगवान शिव की परिक्रमा कैसे करें ?
शिवपिंडी को देखते हुए, उसके सामने खडे रहने पर हमारी दाईं ओर अभिषेक का जल जाने के लिए बनाई गई जलप्रणालिका होती है । परिक्रमा का मार्ग यहां से प्रारंभ होता है । हमारी बाईं ओर से आरंभ कर जलप्रणालिका के दूसरे छोर तक जाना हैं (घडी की दिशा में) । फिर बिना जलप्रणालिका को लांघते, मुडकर पुनः जलप्रणालिका के प्रथम छोर तक आना हैं । ऐसा करने से एक परिक्रमा पूर्ण होती है । यह नियम केवल मानव-स्थापित अथवा मानव-निर्मित शिवलिंग के लिए ही लागू होता है; स्वयंभू लिंग या चल अर्थात पूजाघर में स्थापित लिंग के लिए नहीं ।
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