श्रीलंका के उदय, संघर्ष और सांस्कृतिक गौरव
सत्येन्द्र कुमार पाठक
समुद्र के गर्भ से निकलता इतिहास हिंद महासागर की गोद में बसा एक छोटा सा द्वीप, जिसे भारत का 'आंसू' कहा गया, कभी 'ताम्रपर्णी' बना, कभी 'सेलेओ' तो कभी 'सीलोन'। आज जिसे हम श्रीलंका कहते हैं, उसका इतिहास मात्र एक देश की कहानी नहीं, बल्कि सभ्यताओं के मिलन, संघर्ष और अटूट मानवीय जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है। 34,000 साल पुराने आदिम पदचिह्नों से लेकर आधुनिक लोकतंत्र की चुनौतियों तक, श्रीलंका का सफर किसी रोमांचक उपन्यास से कम नहीं है। श्रीलंका के इतिहास की नींव 'बालंगोडा मानव' ने रखी थी। लगभग 34,000 वर्ष पूर्व, मेसोलिथिक युग के ये शिकारी-संग्रहकर्ता इस द्वीप के स्वामी थे। ताजा उत्खनन और वैज्ञानिक विश्लेषण एक चौंकाने वाला तथ्य सामने लाते हैं—जहाँ एक ओर यहाँ के आदिम मानवों का संबंध दक्षिण भारत से था, वहीं शुरुआती बसावटों के तार उत्तर भारत के लोगों से भी जुड़े थे। ईसापूर्व 15,000 तक यहाँ के लोग खेती (जौ) से परिचित हो चुके थे। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन मिस्र में ईसा पूर्व 1500 के आसपास उपलब्ध दालचीनी का मूल स्रोत श्रीलंका ही था। यह इस बात का प्रमाण है कि जब दुनिया के नक्शे बन रहे थे, तब यह द्वीप वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था।
. राजकुमार विजय और उत्तर भारतीय संबंध में बौद्ध ग्रंथों 'दीपवंश' और 'महावंश' के अनुसार, श्रीलंका के शाही इतिहास का प्रारंभ राजकुमार विजय से होता है। दंतकथाओं के अनुसार, एक सिंह (शेर) और राजकुमारी के संयोग से जन्मे वंशज 'सिंहली' कहलाए। विजय अपने 700 अनुयायियों के साथ कलिंग (आधुनिक ओडिशा) से यहाँ आए थे।
भाषाई सेतु में सिंहली भाषा का गुजराती और सिंधी भाषा से गहरा जुड़ाव इस ऐतिहासिक प्रवास की पुष्टि करता है। विजय ने इस द्वीप को 'ताम्रपर्णी' नाम दिया, जिसका अर्थ है 'तांबे के पत्तों जैसी भूमि'। यही नाम आगे चलकर यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी के नक्शों में भी अंकित हुआ।
. रामायण और श्रीलंका भारतीय पौराणिक काव्यों में श्रीलंका को 'लंका' के रूप में चित्रित किया गया है। ईसापूर्व चौथी से दूसरी सदी के बीच रचित रामायण में इसे राक्षसराज रावण का निवास बताया गया है। आज भी श्रीलंका के नुआरा एलिया की पहाड़ियों में 'सीता एलिया' (अशोक वाटिका) और रावण एला (झरने और गुफाएं) जैसे स्थल मौजूद हैं। स्थानीय लोग रावण को केवल एक खलनायक नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान और महान चिकित्सक के रूप में पूजते हैं, जिसने 'हेला' सभ्यता को ऊंचाइयों पर पहुँचाया।
धम्म का आगमन: महेंद्र और संघमित्रा का युग - तीसरी सदी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा के आगमन ने श्रीलंका की आत्मा को बदल दिया। राजा देवनमपिया टिस्सा के शासनकाल में बौद्ध धर्म यहाँ पहुँचा। संघमित्रा अपने साथ बोधि वृक्ष की एक शाखा लाईं, जो आज भी अनुराधापुरा में सुरक्षित है। यह न केवल धार्मिक परिवर्तन था, बल्कि वास्तुकला, लिपि और दर्शन के एक नए युग का सूत्रपात था।
श्रीलंका का इतिहास दक्षिण भारतीय राजवंशों—चोल, पांड्य और पल्लव—के आक्रमणों और शासन से अछूता नहीं रहा।
चोल राजा एलारा ने यहाँ दशकों तक न्यायपूर्ण शासन किया, जिसे बाद में सिंहल नायक दुत्तु गेमुनु ने पराजित किया।
चोल साम्राज्य का स्वर्ण काल: 10वीं-11वीं शताब्दी में राजराज चोल और राजेंद्र चोल ने पूरे द्वीप पर विजय प्राप्त की। उन्होंने अनुराधापुरा को नष्ट कर पोलोन्नरुवा को नई राजधानी बनाया और वहां भव्य शिव मंदिरों का निर्माण कराया।
: जल प्रबंधन के दूरदर्शी नायक 12वीं शताब्दी में राजा पराक्रमबाहु प्रथम का उदय हुआ। उन्हें 'जल प्रबंधन का जनक' कहा जाता है। उन्होंने घोषणा की थी कि "आकाश से गिरने वाली बारिश की एक भी बूंद बिना उपयोग के समुद्र में नहीं जानी चाहिए।" उनके द्वारा निर्मित 'पराक्रम समुद्र' आज भी श्रीलंका की कृषि का आधार है। उन्होंने बर्मा और दक्षिण भारत तक अपनी नौसेना भेजी, जो श्रीलंका की सैन्य शक्ति का चरमोत्कर्ष था।
. यूरोपीय औपनिवेशिकता का ग्रहण - 16वीं शताब्दी में यूरोपीय शक्तियों की नजर यहाँ के मसालों पर पड़ी।
पुर्तगाली (1505): इन्होंने व्यापारिक किलों के माध्यम से तटीय इलाकों पर कब्जा किया।डच (1630): पुर्तगालियों के जुल्म से बचने के लिए सिंहली राजाओं ने डचों की मदद ली, लेकिन डच स्वयं शोषक बन गए। ब्रिटिश (1815): 19 साल तक कैंडी के राजा की कैद में रहे एक अंग्रेज यात्री की पुस्तक ने अंग्रेजों का ध्यान खींचा। अंततः 1815 में कैंडी के अंतिम राजा श्री विक्रमा राजसिंघे के आत्मसमर्पण के साथ पूरा द्वीप ब्रिटिश क्राउन के अधीन हो गया।
1930 के दशक में शुरू हुआ स्वाधीनता आंदोलन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सफल हुआ। 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को पूर्ण स्वतंत्रता मिली। लेकिन आजादी के बाद देश जातीय संघर्ष (सिंहली बनाम तमिल) की आग में झुलस गया। 1980 के दशक से शुरू हुआ 'लिट्टे' के साथ गृहयुद्ध 2009 में समाप्त हुआ, जिसने देश की सामाजिक और आर्थिक संरचना को गहरा घाव दिया।
. सांस्कृतिक धरोहर - आज श्रीलंका अपनी सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन के बल पर उठ खड़ा हुआ है। कैंडी का 'दंत मंदिर', सिगिरिया का किला और दक्षिण के नीले समुद्र तट दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यहाँ का 'सीफूड', 'हॉपर्स' और 'सिलोन टी' वैश्विक ब्रांड बन चुके हैं।: प्राचीनता और आधुनिकता का संगम श्रीलंका का इतिहास हमें सिखाता है कि कैसे एक छोटा सा देश अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पूरी दुनिया का केंद्र बन सकता है। यहाँ की मिट्टी में बुद्ध की शांति, रावण का पराक्रम, सिंहल राजाओं का स्थापत्य और चोलों की भव्यता समाहित है। चुनौतियों के बावजूद, यह द्वीप आज भी 'हिंद महासागर के मोती' की तरह अपनी चमक बिखेर रहा है।
श्रीलंका की यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि इतिहास के गलियारों में एक पदयात्रा है। यदि आप प्राचीन वास्तुकला और धर्म के विकास को समझना चाहते हैं, तो अनुराधापुरा और कैंडी की गलियाँ आपका इंतजार कर रही हैं।
है।
सिगिरिया का 'सिंह द्वार' - जब हम श्रीलंका के इतिहास की बात करते हैं, तो राजा कश्यप (5वीं शताब्दी) द्वारा निर्मित सिगिरिया (Sigiriya) का जिक्र अनिवार्य है। कल्पना कीजिए एक विशाल 600 फीट ऊँची सीधी चट्टान की, जिसके शिखर पर एक महल बना है। इस किले के प्रवेश द्वार पर दो विशाल सिंह के पंजे तराशे गए हैं। प्राचीन काल में यहाँ सिंह का एक विशाल मुख हुआ करता था, जिसके भीतर से होकर राजा अपने दरबार तक पहुँचते थे। चट्टान की दीवारों पर बनी 'सिगिरिया भित्तिचित्र' (Frescoes) आज भी अपने रंगों की चमक नहीं खोई हैं। ये अप्सराओं के चित्र अजंता की गुफाओं की याद दिलाते हैं और दर्शाते हैं कि उस दौर में श्रीलंका की कला कितनी उन्नत थी। इसे 'विश्व का आठवां आश्चर्य' कहना अतिशयोक्ति नहीं है। : पराक्रमबाहु का 'पराक्रम समुद्र' - 12वीं सदी के पोलोन्नरुवा में खड़े होकर जब आप क्षितिज की ओर देखते हैं, तो आपको पानी का एक अंतहीन विस्तार दिखाई देता है। यह समुद्र नहीं, बल्कि राजा पराक्रमबाहु द्वारा निर्मित एक कृत्रिम जलाशय है।
: 2,400 हेक्टेयर में फैला यह जलाशय उस समय की हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का शिखर था। इसकी नहरें और फीडर टैंक इस तरह बनाए गए थे कि सूखे के समय में भी पूरे राज्य में हरियाली रहती थी। आज भी, जब आधुनिक इंजीनियर इसे देखते हैं, तो वे दंग रह जाते हैं कि बिना आधुनिक मशीनों के, ढलान (Gradient) की इतनी सटीक गणना कैसे की गई थी। यह केवल एक टैंक नहीं, बल्कि श्रीलंका की 'चावल के कटोरे' वाली पहचान का आधार था।: कैंडी का पतन और 'दंत अवशेष' की रक्षा में 1815 का वह दृश्य जब कैंडी के अंतिम दुर्ग पर यूनियन जैक (ब्रिटिश झंडा) फहराया गया, श्रीलंका के इतिहास का सबसे भावुक क्षण था। पहाड़ियों के बीच छिपे कैंडी शहर में जब ब्रिटिश सेना दाखिल हुई, तो गलियों में सन्नाटा था। राजा को बंदी बनाकर ले जाया जा रहा था, लेकिन लोगों की आँखों में डर से ज्यादा चिंता अपने 'पवित्र दंत अवशेष' को लेकर थी। किंवदंती है कि जब तक यह अवशेष कैंडी में रहा, अंग्रेजों का पूर्ण अधिकार नहीं माना गया। आज भी, जब 'एसाला पेराहेरा' उत्सव में हाथियों के ऊपर स्वर्ण करंडक में इसे निकाला जाता है, तो पूरा शहर उस पुरानी राजशाही की गरिमा में डूब जाता है। श्रीलंका का इतिहास युद्धों, आक्रमणों और उपनिवेशवाद की लंबी परछाइयों से गुजरा है। लेकिन इसकी असली ताकत इसकी सांस्कृतिक लचीलापन में है। जहाँ एक ओर यहाँ की मिट्टी में रामायण के प्रमाण मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर यह आधुनिक नौवहन और वैश्विक व्यापार का सेतु बना हुआ है।
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