घूम रहा है काल का पहिया
डॉ. अंकेश कुमारमुश्किल है पीछे हटना,
मुश्किल है आगे बढ़ना।
हां मुश्किल है अंधेरों में ,
खुद से खुद ही बिछड़ना।
हजारों साल की यात्राएं,
शास्त्रों में लिखी कविताएं,
जी भर जिया लेकिन,
कम ही सीखा संभलना।
हालात इतने तंग होंगे,
सोच के इतने रंग होंगे,
चेहरों के भीतर कई चेहरे,
देख जिन्हें लोग, दंग होंगे।
घूम रहा है काल का पहिया,
जीत रहा है सिर्फ रुपइया।
त्याग, समर्पण,सरस, समरस
भाग रहा बन भूत है भईया।डॉ. अंकेश कुमार, पटना
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