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अधकचरों को चाहिए “ऊँची कुर्सी”

अधकचरों को चाहिए “ऊँची कुर्सी”

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र “राकेश”
अपने हाथ से साढ़े तीन हाथ का इंसान, जब साढ़े सात हाथ की लाठी के सहारे ऊँचाई पर स्थापित हो जाता है, तो फिर उसे नीचे जाने का मन ही नहीं करता! आखिर भला अधोगति को प्राप्त करना ही कौन चाहेगा? सुप्रीम कोर्ट भी साढ़े सात हाथ की लाठी के खिलाफ कोई कानून लेकर आ जाए, फिर भी बालू की भित्ति पर कंक्रीट का छत ढालने की आदत जिसे पड़ गई हो, वह भला खामोश क्यों रहेगा?
— साढ़े सात हाथ के बाँस की फराठी में लाल झंडा लगाकर, लाल-लाल आँखों से अंगारे उगलते हुए—
“इंकलाब ज़िंदाबाद”,
“जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा”,
“सुप्रीम कोर्ट मुर्दाबाद!”,
“ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद!!”,
“तिलक, तराजू और तलवार—इनको मारो जूते चार”
जैसे नारों के साथ अपनी-अपनी गली से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आकर ज़ोर-ज़ोर से आम जनता का आह्वान करने लगेंगे।
…इन्हीं नारों की गूँज में विवेक की आवाज़ सबसे पहले कुचली जाती है। प्रश्न योग्यता का नहीं रह जाता, प्रश्न ‘हक़’ का बना दिया जाता है—और हक़ भी ऐसा, जो कर्म, क्षमता और कर्तव्य से नहीं, बल्कि जन्म-पहचान से तय हो।
यहीं से शुरू होती है उस व्यवस्था की त्रासदी, जिसमें मेहनत अपराध बन जाती है और अधकचरी तैयारी प्रमाणपत्र। विद्यालयों में शिक्षक स्वयं विषय से डरे रहते हैं, विश्वविद्यालयों में शोध केवल डिग्री पाने की औपचारिकता बन जाता है, और परीक्षा-प्रणाली उस पुल की तरह हो जाती है—जो उद्घाटन से पहले ही दरकने लगता है।
अस्पताल में रोगी को डॉक्टर नहीं, कोटे का परिणाम देखता है।
रेलवे में पटरी पर दौड़ती ट्रेन नहीं, समझौते की योग्यता दौड़ती है।
न्यायालय में न्याय नहीं, संविधान की चुनिंदा व्याख्या बैठती है।
और जब कोई पूछ ले—
“क्या राष्ट्र-निर्माण के लिए केवल आरक्षण ही पर्याप्त है?”
तो उत्तर मिलता है—
“तुम्हारी सोच मनुवादी है, ब्राह्मणवादी है, प्रतिक्रियावादी है।”
यह एक अजीब विडंबना है कि प्रतिभा को विशेषाधिकार कहकर खारिज किया जाता है, लेकिन अयोग्यता को अधिकार बना दिया जाता है। जो छात्र रातों को जागकर पढ़ता है, उसकी मेहनत को “सिस्टम की देन” कहा जाता है; और जो छात्र न्यूनतम तैयारी के साथ सर्वोच्च पद पा लेता है, वह “सामाजिक न्याय का प्रतीक” घोषित कर दिया जाता है।
यहाँ सवाल आरक्षण के अस्तित्व का नहीं है-
सवाल आरक्षण के अंध-उपयोग का है।
सवाल यह है कि क्या सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि----
कमज़ोर को मज़बूत बनाया जाए, या
मज़बूत की टाँग काटकर कमज़ोर को आगे कर दिया जाए?
जब साढ़े तीन हाथ का व्यक्ति साढ़े सात हाथ की लाठी से ऊँचाई पर पहुँचता है, तब समस्या उसकी ऊँचाई नहीं होती-समस्या यह होती है कि वह ऊँचाई को स्थायी अधिकार समझ बैठता है। और जब उससे जवाबदेही माँगी जाती है, तो वह योग्यता के प्रश्न को साज़िश बताने लगता है।
धीरे-धीरे राष्ट्र का चरित्र बदलता है।
मेधा पलायन करती है।
संस्थान खोखले होते हैं।
और व्यवस्था तालियों से चलने लगती है, परिणामों से नहीं।
विडंबना यह है कि जिनके नाम पर यह पूरी संरचना खड़ी की गई थी—वे आज भी वहीं खड़े हैं। लाभ ऊपर तक पहुँच चुका है, पर नीचे सिर्फ नारे बचे हैं। सामाजिक न्याय का सपना राजनीतिक पूँजी में बदल चुका है, और शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग—सब प्रयोगशाला बन चुके हैं।
तब राजनेता भी कहाँ बैठने वाले हैं! उन्हें तो बस मसाला चाहिए- एटम बम तैयार करने के लिए, रिहर्सल हुआ आज का गोला चाहिए राजनीतिक लिट्टी सेंकने के लिए।
“आ जाओ, मेरे वफादार पढ़े-लिखे महामूर्ख साथियों! हम तुम्हारे साथ हैं। एकजुट होकर हमारे साथ खड़े हो जाओ। हम सब मिलकर सीधे राजभवन चलेंगे, और फिर बड़े वाले राजभवन पहुँचने का भी किसी तरह जुगाड़ बैठाएँगे। हमारा एक-सूत्रीय अभियान है - अधकचरों और मूर्खों को विशेष दर्जा दिलवाना। हो सके तो दलित के बाद महादलित वाले स्टाइल में, मूर्ख के बाद महामूर्ख पद को भी संवैधानिक मान्यता दिलवाना।
इसी कड़ी में, लगे हाथ संविधान के साथ खिलवाड़ करते हुए कोई नया अनुच्छेद जुड़वा देना-विशेष अध्यादेश लगाकर-कि मूर्ख को मूर्ख कहने पर बिना किसी सुनवाई के सीधे मृत्युदंड सुना दिया जाए। इसमें किसी विचार, किसी लाग-लपेट, तर्क-वितर्क, जिरह-बहस के लिए कोई स्थान नहीं। मृत्युदंड सिर्फ सुनाया ही न जाए, बल्कि कोर्ट-रूम में कठघरे के बगल में, न्यायाधीश के सामने ही सीधे फाँसी पर लटका देने का प्रावधान हो, ताकि मौका पाकर अपराधी कहीं फरार न हो जाए!”
काना को काना, लंगड़े को लंगड़ा, अंधे को अंधा कहना सामाजिक दृष्टिकोण से सभ्य समाज के लिए उचित तो नहीं, किंतु हकीकत तो हकीकत ही होती है। अंधे, लंगड़े, गूँगे, बहरे भला दिव्यांग कैसे हो सकते हैं?
दिव्य + अंग = सुंदर शरीर वाले को ही दिव्यांग कहा जाता है। क्या ‘दिव्यांग’ कहना शारीरिक रूप से कमज़ोर व्यक्तियों के लिए कटु मज़ाक नहीं है? मैं तो कहूँगा कि उन मासूम लोगों के लिए ‘दिव्यांग’ कहना, उन्हें गाली देने जैसा है।
हमारे प्रधानमंत्री ने ‘दिव्यांग’—“दिव्य” शब्द की एक नई साहित्यिक और संवैधानिक परिभाषा रचकर—नया इतिहास ही बना डाला।
यहाँ ‘दिव्यांग’ शब्द की मौलिकता पर चर्चा का कोई मतलब नहीं है और मैं इस पर चर्चा भी नहीं करना चाहता। किंतु जिस प्रकार किसी अंग से कमज़ोर व्यक्ति को दिव्यांग कहा जा सकता है, तो फिर मूर्ख—अर्थात “बुद्धि-विहीन”—लोगों को भी दिव्यांग का प्रमाण-पत्र दिया जाना चाहिए, ताकि उन्हें भी आरक्षण का पूरा लाभ मिल सके। आरक्षण ही नहीं, आरक्षण में आरक्षण का लाभ भी!
अपनी गरीबी और दुर्दशा पर भी प्रसन्न रहने वाले सवर्णों (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ) के लिए क्या? पंडित जी को पंडितवा/पांडे कह देने पर भी कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता है? इस गरीब को न राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, न ही आर्थिक मज़बूती। ब्राह्मण की संपत्ति उसकी शिक्षा है, और इसी शिक्षा पर ब्राह्मण सदा से गर्व करते आए हैं—तो क्यों न ब्राह्मणों के लिए शिक्षा प्राप्त करने का मार्ग ही अवरुद्ध कर दिया जाए?
वैसे भी हमारे सेक्युलर संविधान ने—‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ वाले संविधान ने—पंडित को पंडितवा कहने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं जताई है। मनुस्मृति फाड़ने-जलाने में शासन-प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं। हमारे आराध्य देवी-देवताओं के साथ-साथ वेद-पुराण-उपनिषद, गीता और रामायण किसी पर भी कैसी भी अभद्र टिप्पणी करने की खुली छूट है। किंतु अन्य जाति-समूहों में किसी जाति को उसकी जाति कह देना ही पर्याप्त अपराध है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि--
“आरक्षण चाहिए या नहीं?”
वास्तविक प्रश्न यह है कि-
क्या देश को अयोग्यता का आरक्षण चाहिए, या योग्यता का संरक्षण?
यदि व्यवस्था ने समय रहते यह आत्ममंथन नहीं किया, तो साढ़े सात हाथ की वही लाठी एक दिन पूरे ढाँचे को ही गिरा देगी—और तब न नारा बचेगा, न कुर्सी, न ही वह राष्ट्र, जिसकी दुहाई देकर यह सब किया जा रहा है।
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