हर नज़रिये को परख कर, विवेचना जब करेंगे,
सत्य क्या, आवरण में क्या, विवेचना तब करेंगे।माँग और उपलब्धता का, चोली दामन साथ है,
वर- वधु योग्य की चाहत, विवेचना अब करेंगे।
हो अकेला घर में अपने, वर ऐसा चाहिए,
काम का बन्धन न कोई, घर ऐसा चाहिए।
हो बड़ी सी नौकरी, नौकर भी घर में रहें,
सास ससुर शीश झुकायें, डर ऐसा चाहिए।
चाहिए सब कुछ अनुठा, कीमत चाहे जो रहे,
माँ बाप की चाहत यही, बिटिया रानी बन रहे।
खामोश रहना सीख ले, परिवार वर पक्ष का,
मुँह अगर खोला जरा तो, दहेज की धारा रहे।
खाने पहनने घूमने की, आज़ादी उसकी रहे,
कल्ब किट्टी और पिक्चर, आज़ादी उसकी रहे।
कोई टोके न कोई रोके, शर्त शादी से पहले,
रिश्तों के बंधन से मुक्ति, आजादी उसकी रहे।
अ कीर्ति वर्द्धन
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