वसन्त के प्रति
डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
वसन्त!
तुम आग हो,
आग से ही पैदा हुए हो,
होलिका-दहन
संवत्-दहन
गगनचुम्बी आग की लपटों से
निष्टप्त स्वर्ण की नाईं
निकल आए हो तुम।
वसन्त!
तुम जीवन हो
आग के बिना जीवन कहाँ?
कृपीटयोनि हो
तुम्हीं से कृपीट(जल)
का है उद्भव
जल ही अमृत है,जीवन है
मगर तुम्हारे बिना
आग के बिना
जीवन (जल,अमृत)नहीं।
वसन्त!
तुम बड़े मायावी हो
जलाते भी हो,जिलाते भी हो,
अपने पूर्वरंग शिशिर में
पतझड़ में
जीर्ण पीत पत्तों को
शीर्ण कर देते हो
झाड़ देते हो
पतझड़ जो है,
प्रकृति विषाद की फटी चादर ओढ़े
ठिठुरती है ।
वसन्त !
कहते हैं,ऋतुएँ छः हैं,जिनमें
तुम एक हो प्रथम
ऋतुओं के अधिष्ठाता
गणदेवता तो आठ हैं
तो ऋतुएँ भी आठ होनी चाहिएँ न!
हाँ,ऋतुएँ आठ हैं
छः ऋतुएँ बहिरंग
दो ऋतुएँ मन की अन्तरंग
सुखात्मक और दुःखात्मक।
वसन्त !
गोपीजनवल्लभ कृष्ण की
विभूति हो
"ऋतूनां कुसुमाकरः"
और वसुओं में पावक (अग्नि)
"वसूनां पावकश्चास्मि "।
वसन्त!
मुझे तो ऋतुएँ न छः न आठ
दो ही होती हैं प्रतीत
सुखात्मक और दुःखात्मक
मन की दो ऋतुएँ,बस;
एक तुम हो और दूसरा
तुम्हारा ही पूर्व रूप पतझड़।
वसन्त!
सच तो है कि
पतझड़ में ही,खिजाँ में ही,
तुम्हारा विश्वविमोहन रूप छिपा है ,
दुःख की ही संतान है सुख
और दुःख सुख की,
संसार द्विविरुद्ध सापेक्ष भावों की
क्रीड़ा जो ठहरा!
वसन्त!
एक तुम हो और दूसरा शिशिर
खिजाँ और बहार
छः और आठ ,दो का ही प्रस्तार
मन का ही तो खेल है सारा संसार
बाहर जो है दिखता
है मन का ही तो प्रक्षेपण
"विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतम् "
संसारचक्र के परिवर्तन का कारण
मन ही तो है
"मनः कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्त्तयेद् यत् "।
वसन्त!
मैं और दुःख नहीं चाहता
नहीं चाहता कि फिर पतझड़ आए
तुम से लौ लगा कर
बहुत पतझड़ भुगत लिया
पतझड़ के साथ तुम्हारा
अविनाभाव संबन्ध है
सुख-दुःख की अविनाभावात्मक सापेक्षता है जो!
वसन्त!
अतएव मैं क्षमा चाहता हूँ
मैं तुमसे भी विरक्त,उपरत हो जाना चाहता हूँ
क्यों कि
सुख-दुःख से आतीत्य ही
परम इष्ट है,चिदानन्दसंदोह;
मेरा प्रणाम लो वसन्त!
मेरा प्रणाम।("विश्वं दर्पणदृश्यमान---",भगवत्पाद शंकराचार्य :दक्षिणामूर्त्तिस्तोत्रम् ।"मनः कारणमामनन्ति--",श्रीमद्भागवत-11/23/43 )
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