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सीख और दुलार

सीख और दुलार

सत्येंद्र कुमार पाठक
बस्ता भारी, आँखें भारी, डुग्गू खड़ा उदास,
खेल कूद की दुनिया उसको, लगती सबसे खास।
मम्मी आईं, हाथ बढ़ाया, पकड़ा उसका कान,
बोलीं— "छोड़ो अब शैतानी, ओ मेरे कप्तान!"
पुच्चू खड़ा सजा-धजा सा, पहने सुंदर ड्रेस,
बनी टाई, चमके जूते, जैसे छोटा प्रेस।
मम्मी ने पुच्चू को चूमा, भेजा उसे स्कूल,
बोलीं— "बेटा, पढ़ना-लिखना, जीवन का है मूल।"
डुग्गू बोला— "देखो मम्मी, दोस्त खेल रहे बाहर,
मुझे नहीं जाना है स्कूल, मुझे नहीं पढ़ना अक्षर!"
मम्मी ने तब पास बिठाया, सिर पर फेरा हाथ,
शिक्षा और खेल की महिमा, समझाई एक साथ।
"जो पढ़ता है, वही बढ़ता है, जग में पाता मान,
खेल से बनता शरीर बलिष्ठ, पढ़ाई से बढ़ता ज्ञान।
मैदान सिखाता है लड़ना, और टीम का साथ,
कलम सिखाती है दुनिया को, रखना अपने हाथ।"
"जाओ डुग्गू, स्कूल पुकारे, पढ़कर तुम घर आना,
शाम ढले फिर सखा-संग तुम, जी भरकर खेल रचाना।
शिक्षा बिना जीवन अधूरा, जैसे बिन खुशबू फूल,
पढ़ना-खेलना दोनों साथी, जाओ अब तुम स्कूल।"
पात्रों का चित्रण: ८ साल के डुग्गू की चंचलता और ५ साल के पुच्चू की सरलता। भाव: माँ का कड़ा अनुशासन (कान पकड़ना) और फिर ममता भरा दुलार। संदेश: शिक्षा और खेल के बीच संतुलन का महत्व।


सुनहरा बस्ता और जादुई मैदान
सुबह के आठ बज रहे थे। घर में अफरा-तफरी का माहौल था। ८ साल का डुग्गू अपने सोफे के पीछे छिपा बैठा था, जबकि ५ साल का छोटा पुच्चू अपनी नई स्कूल ड्रेस पहनकर आइने के सामने खुद को निहार रहा था। पुच्चू अपनी टाइट टाई और चमचमाते जूतों को देखकर बहुत खुश था, उसे लग रहा था जैसे वह कोई बड़ा अफसर बन गया हो।
तभी माँ की आवाज गूँजी— "डुग्गू! कहाँ हो तुम? बस आने ही वाली है!"
डुग्गू दबे पाँव खिड़की की ओर बढ़ा। बाहर खेल का मैदान दिख रहा था, जहाँ कुछ बच्चे गेंद से खेल रहे थे। डुग्गू का मन मचल गया। उसने सोचा, "अगर मैं आज स्कूल न जाऊँ, तो पूरा दिन उस मैदान में छक्के छुड़ा सकता हूँ।" उसने धीरे से अपना बस्ता सोफे के नीचे धकेला और पिछवाड़े के दरवाजे से भागने की कोशिश की।
लेकिन माँ की नजरें पारखी थीं। जैसे ही डुग्गू ने दरवाजा खोला, माँ ने पीछे से उसका कान पकड़ लिया।
"आह! मम्मी, दर्द हो रहा है!" डुग्गू बिलबिलाया।
माँ ने मुस्कुराते हुए पर थोड़े सख्त लहजे में कहा, "आजकल तुम्हारा मन पढ़ाई से ज्यादा मैदान में लग रहा है, मिस्टर डुग्गू। चलो, सीधे तैयार हो जाओ!"
पुच्चू अपनी पानी की बोतल लटकाए पास खड़ा था। उसने अपनी मासूम आवाज में कहा, "भैया, देखो मैं तो 'गुड बॉय' बन गया, आप तो 'बैड बॉय' बन रहे हो!" माँ ने पुच्चू के गाल थपथपाए और उसे स्कूल बस तक छोड़ने चली गईं।
जब माँ वापस आईं, तो उन्होंने देखा कि डुग्गू अब भी मुँह फुलाए बैठा है। माँ का गुस्सा अब शांत हो गया था। उन्होंने उसे पास बुलाया और गोद में बिठाकर बड़े प्यार से बाल सहलाए।
माँ ने कहा, "डुग्गू, क्या तुम जानते हो कि मैदान और स्कूल के बीच क्या रिश्ता है?"
डुग्गू ने सिर हिलाया— "नहीं मम्मी, मैदान में मजा आता है और स्कूल में सिर्फ बोरियत।"
माँ ने समझाया, "देखो बेटा, खेल का मैदान तुम्हें ताकत देता है। वह तुम्हें सिखाता है कि हारने के बाद फिर से कैसे खड़ा होना है। लेकिन यह जो स्कूल है न, यह तुम्हें दिमाग की शक्ति देता है। अगर तुम्हारे पास सिर्फ ताकत होगी और बुद्धि नहीं, तो दुनिया तुम्हें पीछे छोड़ देगी। जैसे एक क्रिकेट मैच जीतने के लिए सिर्फ तेज गेंद फेंकना काफी नहीं होता, बल्कि दिमाग से 'स्ट्रेटेजी' भी बनानी पड़ती है।"
डुग्गू ध्यान से सुन रहा था। माँ ने आगे कहा, "जो बच्चा पढ़ता है, वह बड़ा होकर दुनिया को समझता है। और जो खेलता है, वह स्वस्थ रहता है। मैं नहीं चाहती कि तुम सिर्फ किताबी कीड़ा बनो, लेकिन मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम अनपढ़ पहलवान बनो। स्कूल जाओ, अक्षर सीखो, ज्ञान पाओ और शाम को इसी मैदान में जाकर खूब पसीना बहाओ।"
माँ की बातों ने डुग्गू के नन्हे मन पर जादू कर दिया। उसे समझ आ गया कि पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि उसके सपनों की चाबी है। उसने झटपट अपनी ड्रेस पहनी, कंघी की और अपना बस्ता उठाकर माँ के पैर छुए।
जाते-जाते उसने कहा, "मम्मी, आज मैं स्कूल में सबसे ज्यादा सवाल पूछूँगा और शाम को पुच्चू के साथ मैदान में सबसे ज्यादा रन बनाऊँगा!"
माँ ने उसे गले लगाया और हाथ हिलाकर विदा किया। घर के दरवाजे पर खड़ी माँ सोच रही थी कि बच्चे को सही राह पर लाने के लिए कभी कान पकड़ना पड़ता है, तो कभी प्यार से समझाना।


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