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उलझन

उलझन

जय प्रकाश कुवंर
यह दुनियादारी बड़ी उलझन है।
इसी में फंसा सबका तन मन है।।
यहाँ कोई हाव भाव दिखाता है।
कोई झूठा लगाव दिखाता है।।
कोई अपना प्रभाव दिखाता है।
कोई अपना स्वभाव दिखाता है।।
कितनों के हां में हां मिलाओगे।
अंत में खुद ही थक जाओगे।।
यह दुनिया अजीब है दोस्तों।
बाकी सब अपना नसीब है दोस्तों।।
कौन किसका है, समझ आता नहीं।
खुदगर्जी का जाल तोड़ा जाता नहीं।।
यहाँ सब ज्ञान बांटते हैं।
मतलब सधते ही राह नापते हैं।।
यह दुनिया ऐसे ही चलती है।
इसी जाल में सबकी सांस निकलती है।।

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