बेंगलुरु: युगों का संगम
सत्येन्द्र कुमार पाठक
बेंगलुरु, जिसे आज 'भारत की सिलिकॉन वैली' के नाम से जाना जाता है, केवल कांच की इमारतों और ट्रैफिक का शहर नहीं है। यह एक ऐसा जीवंत पालना है जिसमें सतयुग की तपस्या, मध्यकाल का शौर्य और आधुनिक युग का नवाचार एक साथ फल-फूल रहे हैं। समुद्र तल से 3,113 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह शहर अपनी ठंडी जलवायु की तरह ही शांत लेकिन प्रगतिशील इतिहास समेटे हुए है। सनातन जड़ें और संप्रदायों का उदय बेंगलुरु का अस्तित्व केवल 1537 ईस्वी से नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह क्षेत्र 'दंडकारण्य' के निकटवर्ती हिस्सों का भाग माना जाता रहा है।
ऋषि परंपरा के अनुसार, गविपुरम की गुफाओं में गौतम ऋषि ने सतयुग में तपस्या की थी। यह क्षेत्र ऋषियों की 'तपोभूमि' था। मारुत संप्रदाय का बीज: त्रेतायुग में, जब भगवान राम और हनुमान का मिलन हुआ, तो इस दक्षिणी पठार के अनेक क्षेत्र मारुति की शक्ति के केंद्र बने। बेंगलुरु के 'गाली आंजनेय' और 'रागीगुडा' जैसे स्थानों को हनुमान जी की आध्यात्मिक उपस्थिति से जोड़ा जाता है। द्वापर और सूर्योपासना में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में शिव की पूजा और सूर्य की प्रथम किरणों के स्वागत की परंपरा का उल्लेख मिलता है। नंदी पहाड़ियों पर स्थित प्राचीन मंदिर इसी कालखंड की निरंतरता माने जाते हैं।
संप्रदायों का संस्थापन का बेंगलुरु में धार्मिक संप्रदायों का विकास केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज के ताने-बाने को बुनने का माध्यम था। शैव और लिंगायत संप्रदाय में बेंगलुरु की आत्मा 'शैव' है। 9वीं शताब्दी में गंगा और चोल राजाओं ने यहाँ भव्य शिव मंदिरों की नींव रखी। 12वीं शताब्दी में महात्मा बसवन्ना द्वारा प्रवर्तित लिंगायत संप्रदाय ने यहाँ एक सामाजिक क्रांति की। बेंगलुरु के मठों (जैसे बृहन्मठ) ने 'कायका' (श्रम) और 'दासौह' (सेवा) के माध्यम से जातिगत भेदभाव को मिटाकर एक कर्मठ समाज का निर्माण किया। वैष्णव संप्रदाय और रामानुजाचार्य 12वीं शताब्दी में महान संत रामानुजाचार्य ने जब कर्नाटक के मेलुकोटे को अपना केंद्र बनाया, तब बेंगलुरु के आसपास वैष्णव धर्म का व्यापक प्रसार हुआ। वाडियार राजवंश के शासनकाल में 'कोटे वेंकटरमण' जैसे मंदिरों ने इस संप्रदाय को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। जैन और बौद्ध धर्म: शांति का मार्ग में जैन धर्म: चौथी शताब्दी में पश्चिमी गंगा राजवंश के समय बेंगलुरु जैन धर्म का प्रमुख केंद्र था। आज भी चिकपेटे की 'बसादी' (मंदिर) उस काल की याद दिलाती हैं। बौद्ध धर्म संस्कृति में मौर्य सम्राट अशोक के प्रभाव से लेकर आधुनिक 'महाबोधि सोसाइटी' तक, बेंगलुरु ने बौद्ध दर्शन के 'मध्यम मार्ग' को सदैव सम्मान दिया है। शाक्त और मारुत: शक्ति और सुरक्षा के लिए बेंगलुरु की अधिष्ठात्री देवी अन्नाम्मा देवी शाक्त संप्रदाय का केंद्र हैं। वहीं, विजयनगर काल के दौरान गुरु व्यासरज ने 700 से अधिक हनुमान मंदिरों की स्थापना की थी, जिनमें से बेंगलुरु के 'गाली आंजनेय' प्रमुख हैं। यह मारुत संप्रदाय की वीरता का प्रतीक है।
बेंगलुरु की नींव नादप्रभु केम्पेगौड़ा का विजन (1537 ईस्वी) में विजयनगर साम्राज्य के एक सामंत केम्पेगौड़ा प्रथम ने एक आधुनिक शहर की कल्पना की। उन्होंने एक मिट्टी का किला बनाया और शहर की सीमाओं को 'चार मीनारों' से चिन्हित किया। उन्होंने 'पेटे' (बाजार) बसाए जहाँ हर व्यवसाय के लिए अलग गलियाँ थीं। उन्होंने झीलों का निर्माण कराया ताकि शहर कभी प्यासा न रहे। मैसूर रियासत में हैदर अली और टीपू सुल्तान का विजयनगर के पतन के बाद, यह शहर मुगलों, मराठों और अंततः मैसूर के सुल्तानों के अधीन आया। हैदर अली ने केम्पेगौड़ा के मिट्टी के किले को पत्थर का बनाया और टीपू सुल्तान ने यहाँ अपना 'समर पैलेस' बनवाया। टीपू के काल में ही बेंगलुरु एक सैन्य और व्यापारिक गढ़ के रूप में उभरा।
ब्रिटिश काल: कैंटोन्मेंट और गार्डन सिटी (1809-1947) का 1791 में ब्रिटिश कब्जे के बाद, बेंगलुरु में एक बड़ा बदलाव आया। 1809 में यहाँ 'सैन्य छावनी' (Cantonment) बनी। वास्तुकला में ब्रिटिश साम्राज्य ने कब्बन पार्क, बेंगलुरु पैलेस और लालबाग का विकास किया। आधुनिकता के दौर का 1905 में, बेंगलुरु एशिया का पहला शहर बना जहाँ बिजली के लैंप जले। 1864 में यहाँ रेलवे का आगमन हुआ। स्वतंत्रता के बाद: विज्ञान और आईटी की क्रांति 1947 के बाद, नेहरूवादी युग में बेंगलुरु को 'आधुनिक भारत के मंदिरों' (PSUs) के लिए चुना गया। HAL, ISRO, BEL और ITI जैसे संस्थानों ने यहाँ इंजीनियरों की एक नई पीढ़ी तैयार की। सिलिकॉन वैली का 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने बेंगलुरु को वैश्विक मानचित्र पर 'आउटसोर्सिंग हब' के रूप में स्थापित किया। आईटी दिग्गज: इन्फोसिस और विप्रो ने वैश्विक स्तर पर भारत का परचम लहराया है।
आज बेंगलुरु दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। फ्लिपकार्ट, स्विगी और ज़ोमैटो जैसे यूनिकॉर्न की सफलता ने इसे 'स्टार्टअप कै बना। बेंगलुरु का गवी गंगाधरेश्वर मंदिर विज्ञान और धर्म के मिलन का अद्भुत उदाहरण है। मकर संक्रांति पर सूर्य की किरणों का शिवलिंग पर गिरना यह सिद्ध करता है कि हमारे पूर्वज खगोल विज्ञान (Astronomy) में कितने निपुण थे। यह मंदिर सूर्योपासना, शैव मत और मारुत भक्ति का त्रिकोणीय संगम है।
बेंगलुरु एक ऐसा शहर है जिसने अपनी प्राचीन पहचान (बेंगलुरु - उबली हुई फलियों का शहर) को खोए बिना भविष्य की ओर कदम बढ़ाए हैं। यहाँ एक ओर 'कन्नड़ संस्कृति' की मिठास है, तो दूसरी ओर 'ग्लोबल' होने का साहस।
यहाँ के मठ आज भी शिक्षा और भोजन का दान दे रहे हैं, हनुमान मंदिर शक्ति का संचार कर रहे हैं, और आईटी पार्क दुनिया की समस्याओं का समाधान खोज रहे हैं। बेंगलुरु का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह सनातन संप्रदायों के सह-अस्तित्व और मानवीय नवाचार की एक अमर कहानी है। सतयुग से शुरू हुई यह यात्रा, कलियुग के तकनीकी शिखर तक पहुँच चुकी है। बेंगलुरु कल भी ज्ञान का केंद्र था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा।
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