आॅनलाइन और प्रीपेड
जय प्रकाश कुवंरहमें अपने बुजुर्गों से अब तक,
जो कुछ प्राप्त था, वो साक्षात था।
लेकिन वो साक्षात सब धीरे धीरे,
खिसकता चला गया।
अब मोबाईल युग के आने से,
सब कुछ हो रहा है नया नया।।
अब आॅनलाइन पूजा है,
सामने पुरोहित यजमान की नहीं दरकार है,
तुरंत चढ़ावे की किसी जगह जरूरत नहीं,
सब प्रीपेड संस्कार है।
लोगों की व्यस्तता है इतनी की,
नहीं कोई साक्षात की दरकार है।।
कहीं रहो, आर्डर एवं भुगतान करो,
घर पर सब कुछ चला आएगा।
पूजा पाठ, अंतिम संस्कार तक,
सब मोबाईल से हो जाएगा।।
अब रह गया है, शादी के मंडप में,
दूल्हा दुल्हन की उपस्थिति,
और मांग भराई आदि की रस्म।
वह साक्षात रस्म भी हो सकता है,
निकट भविष्य में मिट जाए,
तब दुल्हन की मांग भी आॅनलाइन,
दूल्हा दूर भी रहे, मोबाईल से भरा जाएगा।।
धन्य हो मोबाईल देवता,
तुमने व्यस्त लोगों के लिए,
कितना शुलभ सब रास्ता निकाला।
अपनी वैज्ञानिक शक्ति ऐसी फैलाई की,
हमारे पुरातन संस्कृति को मिटा डाला।।
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