उपहार
अरुण दिव्यांशप्रकृति के एह सृष्टि में ,
प्रकृति सृजनहार बा ।
जल थल एह सृष्टि के ,
प्राकृतिक आधार बा ।।
सृष्टि रूपी दुनिया में ,
आदमी के बाजार बा ।
बेईमानी आ शोषण के ,
बड़ बड़ खरीददार बा ।।
आदमी के बाजार में ,
क्रेता विक्रेता हजार बा ।
केहू बेंचे घमंड ईर्ष्या ,
केहू त बेंचत प्यार बा ।।
का करीं प्यार के बड़ाई ,
प्यार जीवन शृंगार बा ।
प्यार खरीददार बा उहे ,
जे हिर्दय बड़ उदार बा ।।
जे हिर्दय के उदार मिली ,
मानवता में निखार बा ।
मानवता निखार भईल ,
जीवन सुनर अपार बा ।।
आदमी के एह बाजार में ,
छल कपट के कतार बा ।
कल बल छल कतार में ,
पहिले खड़ा अहंकार बा ।।
कोई कहे ई मथुरा काशी ,
कोई कहे ई हरिद्वार बा ।
कोई पावन प्यार किनत ,
ओही में हरि दरबार बा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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