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मिथिला चित्रकला संस्थान में लुप्तप्राय लोकगीतों को पुनर्जीवित करने का अनूठा प्रयास

मिथिला चित्रकला संस्थान में लुप्तप्राय लोकगीतों को पुनर्जीवित करने का अनूठा प्रयास
चार दिन में 21 दुर्लभ गीतों में पारंगत हुए चित्रकार बन रहे गायक
तीनों पद्मश्री कलाकार हृदय नारायण झा की शिक्षण शैली से अभिभूत

मधुबनी, 1 फरवरी, 2026: मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सराहनीय प्रयास मधुबनी स्थित मिथिला चित्रकला संस्थान में देखने को मिल रहा है। यहां 28 जनवरी से 12 दिवसीय लोकगीत कार्यशाला का आयोजन किया गया है, जिसमें संस्थान के चित्रकार छात्र-छात्राएं अब रंगों के साथ-साथ स्वरों की दुनिया में भी महारत हासिल कर रहे हैं।

इस कार्यशाला के माध्यम से मैथिली के लुप्तप्राय हो चुके संस्कार गीतों, पारंपरिक एवं व्यवहार लोकगीतों को नई जिंदगी देने का कार्य किया जा रहा है। प्रशिक्षण का दायित्व 'भारत के महारथी' सम्मान से विभूषित, आकाशवाणी, पटना के वरिष्ठ लोकगीत गायक, प्रसिद्ध गीतकार एवं योग विशेषज्ञ श्री हृदय नारायण झा को सौंपा गया है। श्री झा न केवल एक गायक और शोधकर्ता हैं, बल्कि मैथिली और भोजपुरी लोक संस्कृति के एक संवाहक के रूप में विख्यात हैं। छठ गीतों के लिए विशेष रूप से सम्मानित और लोकप्रिय गीतकार के रूप में उनकी पहचान रही है। उनकी सहज, आत्मीय और प्रभावी शिक्षण शैली ने न केवल छात्रों को तेजी से सीखने में मदद की है, बल्कि कार्यशाला में पधारे तीन पद्मश्री कलाकारों को भी गहरे तक प्रभावित किया है।

आश्चर्यजनक रूप से, कार्यशाला के मात्र चार दिनों में ही प्रतिभागियों ने हृदय नारायण झा के मार्गदर्शन में 21 लुप्तप्राय गीतों को कंठस्थ कर लिया है। इनमें प्राती, भगवती गीत, ब्राह्मण गीत, धर्मराज गीत, हनुमान गीत, सोहर, खेलउना, बधैया जैसे गीत शामिल हैं, साथ ही उपनयन संस्कार के साँझ गीत और विवाह संस्कार के कुमार, सम्मर, परिछन, जयमाल, कन्यादान जैसे अनमोल गीत भी इसमें सम्मिलित हैं।

कार्यशाला के साक्षी और मिथिला पेंटिंग की प्रख्यात हस्ताक्षर पद्मश्री दुलारी देवी ने कहा, "यह कार्यशाला संस्थान के बच्चों को हमारी मैथिली लोकगीत संस्कृति से पुनः जोड़ रही है। ये बच्चे वैसे गीत सीख रहे हैं जो मैं बचपन में सुनती थी, लेकिन अब लगभग विलुप्त हो चुके हैं। मुझे विश्वास है कि ये गीत सीखने से इनकी पेंटिंग में भी नई जान आएगी।"

वहीं, पद्मश्री बौआ देवी ने हृदय नारायण झा की प्रशंसा करते हुए कहा, "झा जी जिस सहजता और ममता से इन बच्चों को सिखा रहे हैं, वह देखने लायक है। ऐसा लगता है जैसे माँ अपने बच्चों को उनकी विरासत की धरोहर सौंप रही हो। इस प्रयास से यह परंपरा इन नवयुवाओं के माध्यम से पुनः जागृत होगी।"

पद्मश्री शिवन पासवान ने इस पहल को सामाजिक सरोकार से जोड़ते हुए कहा, "पहले गाँवों में बिना साज-बाज के इन्हीं गीतों से पूजा-पाठ होता था, वो माहौल अब कहीं नहीं है। हृदय नारायण जी ने जो बीज बोया है, वह आगे चलकर इन बच्चों के द्वारा पूरे समाज में फैलेगा और ये गीत फिर से गूंजने लगेंगे।"

संस्थान के प्रभारी उप निदेशक एवं जिला कला संस्कृति पदाधिकारी श्री नितीश कुमार ने बताया, "यह संस्थान बिहार की सभी लोक परंपराओं के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। हृदय नारायण झा जी जैसे प्रतिष्ठित और सम्मानित गीतकार का यह भागीरथ प्रयास निश्चित रूप से लोकगीतों की गंगा को पुनः प्रवाहित करने में सफल होगा।"

कार्यशाला के सूत्रधार एवं संयोजक, कनिष्ठ आचार्य श्री प्रतीक प्रभाकर ने इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, "मिथिला चित्रकला और लोकगीत का संबंध माँ और बेटी जैसा है। कोई भी पारंपरिक चित्र बिना सामूहिक गीतों के पूरा नहीं होता था। इस कार्यशाला के माध्यम से श्री हृदय नारायण झा जी का लोकगीतों के क्षेत्र में किया गया गहन शोध, संकलन, उनकी गीतकार की प्रतिभा और दशकों की साधना सीधे तौर पर नई पीढ़ी को मिल रही है। यह हमारी एक बड़ी उपलब्धि है।"

इस कार्यशाला के माध्यम से एक प्रतिष्ठित गीतकार और संस्कृतिकर्मी का अनुभव सीधे युवा माध्यम से जुड़ रहा है। यह पहल न केवल मिथिला, बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल है कि कैसे लुप्त होती कला परंपराओं को युवा ऊर्जा और विशेषज्ञ मार्गदर्शन के साथ पुनर्जीवित किया जा सकता है। यह समाचार निश्चित ही कला एवं संस्कृति प्रेमियों के लिए एक सुखद और उम्मीद से भरा संदेश लेकर आया है।

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