इंद्रियों को जीत लिया
संजय जैनमन मेरा कुछ कहता है
पर दिल उसकी सुनता नही।
दोनों के झगड़े में पढ़कर।
अब ये शरीर चलता नही।।
मन दिल और आत्मा हमारा।
एक शरीर में रहता है।
फिर भी इन सबको देखो।
क्यों आपस में एक नही।।
अपनी इंद्रियों पर जब तक।
नियंत्रण नही कर पाओगें।
तब तक मानव जीवन की।
तुम दशा नही सुधार पाओगें।।
गौर करो हे दुनिया वालों।
तुम ऋषियों और मुनियों पर।
अपनी तप साधना के बल पर।
इन्होंने इंद्रियों को जीत लिया।।
सबसे ज्यादा त्याग तपस्या देखो।
जैन दिगम्बर मुनियों में दिखती है।
अपने नश्वर शरीर को जिन्होंने।
पूरा ही जो नंग किया।।
त्याग तपस्या और साधना का।
इसे बड़ा कोई उदाहरण नही।
कलयुग में भी सतयुग जैसा।
आचार विचार देखने को मिला।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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