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"निर्णय का हाथ"

"निर्णय का हाथ"

पंकज शर्मा
न कलम कोई चमत्कारी धातु है,
न स्याही में युद्धों का रक्त जमता है।
शब्द, काग़ज़ पर उगते हैं
पर किले नहीं ढहाते—
वे केवल चेतना की नींव हिलाते हैं।


न तलवार कोई अंतिम उत्तर है,
उसकी धार प्रश्न नहीं पूछती।
वह क्षण भर में इतिहास बदल देती है,
पर भविष्य की भाषा
उसके लोहे से नहीं गढ़ी जाती।


मनुष्य ने दोनों को जन्म दिया—
एक को विचार की कोख से,
एक को भय की आग से।


फिर स्वयं ही उन्हें
एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया।
पर समय—
वह न कलम से डरता है
न तलवार से।
वह तो उन हाथों को भी थका देता है
जो स्वयं को सर्वशक्तिमान समझते हैं।


घड़ी कलाई पर बंध जाती है,
पर समय नहीं रुकता।
सूइयाँ घूमती हैं
और मनुष्य भ्रम पालता है
कि उसने क्षणों को क़ैद कर लिया।


असल शक्ति धातु या स्याही में नहीं,
ना ही टिक-टिक करती मशीन में।
वह शक्ति उस विवेक में है
जो जानता है
कब मौन अधिक क्रांतिकारी है।


वही हाथ समर्थ है
जो लिखते समय भी काँपता है,
और उठते समय भी सोचता है।
जो जानता है
कि हर युद्ध लड़ा नहीं जाता।


और वही हाथ इतिहास रचता है—
जो सही क्षण पर
कलम रख देता है,
तलवार म्यान में डाल देता है,
और समय के सामने
नतमस्तक खड़ा हो जाता है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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