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बस धीरज का छोर न छूटे

बस धीरज का छोर न छूटे

अरुण दिव्यांश
क्यूॅं चेहरा दिखता लूटे लूटे ,
कभी आस का डोर न टूटे ।
जीवन का डोर आस लगा ,
बस धीरज का छोर न छूटे ।।
जीवन तो बना यह पतंग है ,
आस विश्वास पतंग है डोर ।
वारिस तो रहता यह नीचे ,
जिसके हाथ डोर बागडोर ।।
पता न कब डोर कट जाए ,
या स्वत: उखड़ जाए पतंग ।
बागडोर रह जाता हाथ में ,
पतंग करता हवा से जंग ।।
पतंग काम उड़ना कटना ,
प्रकृति का ही ये नियम है ।
हमारा काम जीवन जीना ,
और संग रखना संयम है ।।
संयम रखो व धीरज रखो ,
वह जीवन सुरक्षित रखेगा ।
बस धीरज का डोर न छूटे ,
अन्यथा मजा भी तू उखेगा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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