जब लिखने लगा मां पर,सारे शब्द रोने लगे
कुमार महेंद्रजन्मदात्री उपमा बन,
ममता स्नेह लुटाया ।
अपनत्व सरित रूप धर,
आशा विश्वास जगाया ।
याद कर ज्ञान विमल गंग,
सारे संवाद जीवंत होने लगे ।
जब लिखने लगा मां पर,सारे शब्द रोने लगे ।।
अथक परिश्रम सुपर्याय ,
क्लांत रहित जीवन पथ ।
सदा गुंजित मंद्र गिरा,
आनन स्मित रेख मथ ।
स्मरण कर संस्कार मर्यादा,
व्यक्तित्व आदर्श बीज बोने लगे ।
जब लिखने लगा मां पर,सारे शब्द रोने लगे ।।
ज्ञान मार्ग दिग्दर्शक बन,
उज्ज्वल पथ दिखाया ।
प्रेरणा पुंज शक्ति बन ,
नैतिकता मंत्र सिखाया ।
बोध कर प्रबल धर्म आस्था,
निज पाप प्रमाद धोने लगे ।
जब लिखने लगा मां पर,सारे शब्द रोने लगे ।।
स्नेहिल मृदु मधुर स्वभाव,
संवाद अंतर उमंग उल्लास ।
सात्विकता दर्शन हर कदम,
उत्संग पटल वत्सल उजास ।
कामना शुभाशीष कृपा वृष्टि,
स्मृत स्वर अब पलक भिगोने लगे ।
जब लिखने लगा मां पर,सारे शब्द रोने लगे ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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