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'देहाती दुनिया' ने हिन्दी साहित्य में पहली बार आंचलिक-बोध का स्वाद दिया

'देहाती दुनिया' ने हिन्दी साहित्य में पहली बार आंचलिक-बोध का स्वाद दिया

  • जयंती पर साहित्य सम्मेलन में स्मरण किए गए आचार्य शिवपूजन सहाय और गंगा शरण सिंह,लेख्य मंजूषा की त्रैमासिकी 'साहित्यिक स्पंदन' का हुआ लोकार्पण, आयोजित हुई कथा-संगोष्ठी

पटना, 9अगस्त। आचार्य शिवपूजन सहाय की महान कृति 'देहाती दुनिया' के प्रकाशन का सौ वर्ष पूरा हो गया है। पूरे देश में इसे उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। आधुनिक हिन्दी की यह वह पुस्तक है, जिसमें प्रथम बार 'आंचलिक-बोध' की सुगंध और स्वाद से हिन्दी जगत अवगत हुआ था। आचार्य जी का साहित्यिक व्यक्तित्व हिमालय की भाँति ऊँचा था। एक तपस्वी की भाँति उन्होंने हिन्दी की सेवा की। दधीचि की तरह हिन्दी के लिए अपनी सारी हड्डियाँ गला दीं ।
यह बातें रविवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती-समारोह और कथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि आचार्य शिवजी के हाथ में संपादन की एक ऐसी क्षेणी-हथौड़ी थी, जिससे उन्होंने साहित्य के अनेक अनगढ़ पत्थरों को, सुंदर मूर्तियों में परिवर्तित किया। वे राष्ट्रभाषा परिषद के संस्थापक मंत्री और फिर बाद में निदेशक के रूप में, 1950से 1959तक, कुल 9वर्षों तक, साहित्य सम्मेलन के परिसर में ही रहे। तब परिषद का कार्यालय सम्मेलन-भवन में ही संचालित होता था। यह साहित्य सम्मेलन का स्वर्णिम-काल था। आचार्य जी से दिखाने के लिए, देश भर के साहित्यकार अपनी पांडुलिपियाँ लेकर यहाँ आते थे, जिनमें कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद और 'कामायनी' जैसे महाकाव्य के रचयिता महाकवि जयशंकर प्रसाद सम्मिलित हैं। दूसरी ओर बाबू गंगा शरण सिंह हिन्दी के एक ऐसे ध्वज-वाहक थे, जिन्होंने लिखा तो कुछ भी नहीं, किंतु हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया।

समारोह के मुख्य अतिथि और राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि दोनों हिन्दी-सेवियों के महान अवदान से हिन्दी को बहुत ऊर्जा प्राप्त हुई। आचार्य शिवजी की पौत्री पुनीता सिन्हा ने अपने पिता प्रो मंगलमूर्ति के आलेख को पढ़कर सुनाया। डा रत्नेश्वर सिंह ने आचार्य शिवजी को मनोवैज्ञानिक लेखक बताया।

अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद ने कहा कि आचार्य जी ने अपना संपूर्ण जीवन हिन्दी के लिए अर्पित कर दिया। उनकी विद्वता का अनुमान इसी से किया जा सकता है कि देश के सभी बड़े साहित्यकारों की पांडुलिपियाँ परिशोधन हेतु आचार्य जी के पास आया करती थी।

इस अवसर पर लेख्य-मंजूषा, पटना द्वारा प्रकाशित और लेखिका विभारानी श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित त्रैमासिकी 'साहित्यिक स्पंदन' का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। कथा-गोष्ठी में, वरिष्ठ लेखक मधुरेश नारायण की कहानी 'कृतज्ञता' पर लेखिका रंजना सिंह तथा डा प्रमोद कुमार ने अपनी त्वरित समीक्षाएँ प्रस्तुत की। नूतन सिन्हा की कहानी 'कलम की पुकार' पर आशा रघुदेव, डा पूनम देवा, रवि श्रीवास्तव, पूनम कतरियार तथा डा सुधा सिन्हा ने समीक्षा की। भोपाल की सुप्रसिद्ध लेखिका कल्पना भट्ट की पुस्तक 'नीर-क्षीर' पर डा ध्रुव कुमार, डा अनीता राकेश, डा उषा सिन्हा तथा प्रो सुनील कुमार उपाध्याय ने सांगोपांग चर्चा की।

डा सुधा सिन्हा, डा पुष्पा जमुआर, शमा कौसर शमा, प्रभात धवन, कुमार अनुपम, ज्योत्सना, अनिल कुमार, इन्दुभूषण सहाय, राज प्रिया रानी ने लघुकथाओं के पाठ किए। मंच का संचालन लेख्य मंजूषा की अध्यक्ष विभारानी श्रीवास्तव तथा ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन ईं बाँके बिहारी साव ने किया।

डा आर प्रवेश, चंदा मिश्र, तनुजा सिन्हा, अश्विनी कविता, विजय कुमार शर्मा सहित अनेक प्रबुद्ध जन उपस्थित थे

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