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"बंधन के सत्य की अनुभूति"

"बंधन के सत्य की अनुभूति"

पंकज शर्मा
मनुष्य अपने जीवन में प्रायः यह मान लेता है कि वह संबंधों से बँधा है, व्यक्तियों से जकड़ा हुआ है; किंतु गहन आत्मचिंतन करने पर स्पष्ट होता है कि वास्तविक बंधन मनुष्यों से नहीं, अपितु आशाओं, भावनाओं, उम्मीदों एवं विश्वासों से निर्मित होते हैं। यही सूक्ष्म भावनात्मक सूत्र हमारे निर्णयों, हमारे सुख-दुःख एवं हमारी चेतना की दिशा निर्धारित करते हैं। व्यक्ति बदल जाते हैं, परिस्थितियाँ भी रूपांतरित होती हैं, पर मन में रोपी गई आशाएँ एवं विश्वास लंबे समय तक जड़ें जमाए रहते हैं।


आध्यात्मिक दृष्टि से यह समझना आवश्यक है कि मुक्ति का मार्ग बाह्य संबंधों को तोड़ने में नहीं, बल्कि अंतःकरण के इन बंधनों को पहचानने एवं संतुलित करने में है। जब मनुष्य आशा एवं अपेक्षा के भार से मुक्त होकर कर्म करता है, तब वह सहज, निर्भार एवं सत्य के निकट होता है। यही बोध जीवन को दार्शनिक गहराई एवं आत्मिक शांति प्रदान करता है।


. "सनातन"
*(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)*
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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