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सांस्कृतिक पुनर्जागरण और युवा भारत का नया संकल्प

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और युवा भारत का नया संकल्प

सत्येन्द्र कुमार पाठक
2026 की पहली किरण ने भारत की एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जो न केवल उत्साहजनक है, बल्कि चकित कर देने वाली भी है। अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर से लेकर काशी की गलियों और विंध्याचल की पहाड़ियों तक, जिस तरह युवाओं का रेला उमड़ा, उसने सदियों पुरानी उस धारणा को ध्वस्त कर दिया है कि आधुनिकता केवल पश्चिम का अंधानुकरण है। दशकों से यह विमर्श हमारे समाज पर हावी रहा कि तकनीक और वैश्विक संपर्क भारतीय युवाओं को उनकी जड़ों से दूर कर देंगे। किंतु आज का 'Gen-Z' युवा इस विमर्श को पलट रहा है। वह अपनी पहचान (Identity) को लेकर न तो भ्रमित है और न ही संकुचित। 1 जनवरी के इस सांस्कृतिक दृश्य ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत की नई पीढ़ी सनातन संस्कृति को किसी पुराने बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक 'लाइफस्टाइल' और 'सॉल्यूशन' के रूप में देख रही है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी विशेषता इसका तार्किक स्वरूप है। यह पीढ़ी किसी भी विचार को सिर्फ इसलिए नहीं मानती कि वह परंपरा का हिस्सा है, बल्कि इसलिए अपना रही है क्योंकि वह वैज्ञानिक है। आज का युवा जब योग, ध्यान या कर्म सिद्धांत की ओर मुड़ता है, तो उसके पीछे 'मेंटल वेलनेस' और 'कॉस्मिक बैलेंस' जैसे आधुनिक कारण होते हैं। उनके लिए सनातन धर्म कोई जड़ व्यवस्था नहीं, बल्कि एक अत्यंत लचीला और गतिशील जीवन-दर्शन है।
अयोध्या, काशी , मथुरा और उज्जैन जैसे केंद्रों का कायाकल्प केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि भारतीय मानस की 'सांस्कृतिक पुनर्स्थापना' है। ये स्थल अब युवाओं के लिए केवल श्रद्धा के केंद्र नहीं रहे, बल्कि उनके 'राष्ट्रीय गौरव' और 'सांस्कृतिक आत्मविश्वास' का आधार बन गए हैं। डिजिटल युग का यह युवा अब अपनी विरासत के साथ सेल्फी लेने में हीन भावना नहीं, बल्कि गर्व महसूस करता है।
सबसे सराहनीय पहलू यह है कि यह धार्मिक चेतना केवल मंदिरों के द्वार तक सीमित नहीं रही। तीर्थस्थलों पर स्वच्छता, सेवा और अनुशासन के प्रति युवाओं की सजगता यह दर्शाती है कि वे 'धर्म' को 'सामाजिक उत्तरदायित्व' से जोड़ रहे हैं। यह 'कर्मयोग' की वही अवधारणा है जिसे विवेकानंद ने कभी युवाओं के सामने रखा था।
नववर्ष 2026 भारत के इतिहास में एक मोड़ की तरह दर्ज होगा। यह उस संतुलन का वर्ष है, जहाँ सॉफ्टवेयर और शास्त्र, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अध्यात्म एक साथ चल रहे हैं। भारत का युवा आज यह उद्घोष कर रहा है कि वह वैश्विक नागरिक भी है और अपनी जड़ों के प्रति समर्पित सनातनी भी। यही वह 'मध्यम मार्ग' है जो भारत को भविष्य में विश्व गुरु के आसन की ओर ले जाएगा।
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