ब्राह्मण आत्म चिंतन आत्म सम्मान और सशक्त संगठन के लिए संकल्पित हों:-डॉक्टर विवेकानंद मिश्र

कालचक्र की अनवरत गति में एक और वर्ष आज अतीत के पन्नों में अंकित हो गया। यद्यपि यह वर्ष-परिवर्तन ग्रेगोरियन कालगणना पर आधारित है, तथापि हमने इसे भी व्यवहारतः नववर्ष के रूप में स्वीकार कर लिया है। जबकि सत्य यह है कि हमारा सनातन नववर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही आरंभ होता है—वही दिन जब सृष्टि ने नवजीवन पाया, जब ब्रह्मा ने सृजन का सूत्रपात किया और जब प्रकृति स्वयं नवपल्लव धारण कर नवचेतना का उद्घोष करती है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा केवल एक तिथि नहीं, अपितु भारतीय जीवन-दर्शन का आधार है। यह नववर्ष भोग-विलास का नहीं, बल्कि संयम, संकल्प और आत्मशुद्धि का पर्व है। इसी दिन से विक्रम संवत् का आरंभ होता है, जो हमारी सांस्कृतिक निरंतरता, वैज्ञानिक कालगणना और प्रकृति-संलग्न जीवन पद्धति का जीवंत प्रमाण है। दुर्भाग्यवश, आज हम अपनी ही सनातन काल-परंपरा से विमुख होकर परकीय तिथियों को अधिक महत्व देने लगे हैं—यह विस्मृति केवल पर्व की नहीं, अपितु आत्मपहचान की भी है।
फिर भी, यह अवसर मात्र औपचारिक शुभकामनाओं या उल्लास तक सीमित न रहे। यह समय है आत्मावलोकन और आत्ममंथन का। हमें ईमानदारी से यह विचार करना चाहिए कि बीते वर्ष में हमारे संकल्पित लक्ष्यों की सिद्धि में कौन से अवरोध उपस्थित रहे। वे कौन से प्रश्न हैं जो अब तक अनुत्तरित हैं और जिन पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।
आज यह भी अनिवार्य हो गया है कि हम उन कारणों की खोज करें, जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण का पात्र बनाया। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि वर्तमान समय में संपूर्ण भारतवर्ष के राजनीतिक रंगमंच पर सुनियोजित रूप से ब्राह्मण-विरोध की कठोर मुहिम चलाई जा रही है। यह केवल किसी एक समाज के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि उस ज्ञान-परंपरा पर आघात है जिसने इस राष्ट्र को वेद, उपनिषद, धर्म, नीति और संस्कार प्रदान किए।
जो लोग ब्राह्मण का विरोध करते हैं, उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि ब्राह्मण सत्ता का नहीं, सदैव सत्य का पक्षधर रहा है। उसने न तलवार उठाई, न सिंहासन मांगा—उसने तो युगों-युगों तक समाज को दिशा देने का कार्य किया। ब्राह्मण-विरोध वस्तुतः ज्ञान-विरोध है, संस्कार-विरोध है और अंततः भारत की आत्मा के विरुद्ध विद्रोह है। यह प्रश्न आज केवल “हमारा अपराध क्या है?” भर नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रश्न हमारे वर्तमान के आत्मसम्मान और भविष्य की रक्षा से जुड़ गया है।
यह स्थिति हमें केवल सोचने ही नहीं, बल्कि संगठित होने के लिए भी प्रेरित करती है—विवश करती है कि हम मौन तोड़ें, चेतना जाग्रत करें और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा हेतु वैचारिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ें।
नववर्ष की सच्ची कामना यही है कि हम अतीत की नींव पर भविष्य की सुदृढ़ कल्पना करें। क्योंकि जो समाज अपने इतिहास, अपनी परंपरा और अपने मूल से कट जाता है, उसका भविष्य दिशाहीन हो जाता है। आत्मचिंतन, आत्मसम्मान और संगठन—यही नए वर्ष का वास्तविक संकल्प हो सकता है और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि।
इन्हीं भावों के साथ—
नूतन वर्ष आप सभी के लिए मंगलमय, चेतनाप्रद और संकल्प-सिद्धि का वाहक बने।
असीम शुभकामनाओं सहित।
सादर
डॉक्टर विवेकानंद मिश्र राष्ट्रीय अध्यक्ष भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा डाॅ.विवेकानंद पथ, गोलबगीच गया जी( बिहार)
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