हम पतझड़ लतियावल जाईं?
मार्कण्डेय शारदेयतू बसन्त जी, मौज उड़ावs हम पतझड़ लतियावल जाईं?
एके घर के जनम पलाइल, तू राजा हम रंक कहाईं?
छवो आदमी के हक जब मिलही के बा पारा-पारी।
हमरा के तू देखि जरेलs काहें हो लs अत्याचारी?
बड़का भइया! बहुत सतइलs कइसे हिय के आगि बुझाईं?
तू बसन्त जी, मौज उड़ावs हम पतझड़ लतियावल जाईं?
मझिला भइया पर तहार ना दाल गलेले राजनीति के,
आँखि तरेरेला तs धोती जाले सरकि व्याज रीति के,
ओकरा किहाँ बसाइल ना तs अबर अनुज के खूब सताईं?
तू बसन्त जी, मौज उड़ावs हम पतझड़ लतियावल जाईं?
ओनइस से ना बीस बने देलs हमरा के आजीवन तू,
बिसवें दिवस बसन्त पंचमी मनवावत अइलs सज्जन तू,
ई तहार घुसपैठ चाल कइसों हम शेष समय अड़ि पाईं।
तू बसन्त जी, मौज उड़ावs हम पतझड़ लतियावल जाईं?
अरे! ढेर समय रहला से अउर बड़ा हो जइबs भाई?
जीयs आ जीये दs सभके एही में बाटे मनुसाई,
तू सनेह दs छोट जानि के जेठ जानि सर्वस्व चढ़ाईं।
तू बसन्त जी, मौज उड़ाव हम पतझड़ लतियावल जाईं?
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