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सुन अब इन नयनों की बात

सुन अब इन नयनों की बात

डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी

अमिय हलाहल मद भरे सेत साम रतनार ।
जीयत मरत झुकि झुकि परत जेहि चितवत एक वार ॥
सुना हे भगवान शंकर ने सावर मंत्रों के जाल का सृजन किया था जिसमें केन्द्राभिसारी नयन थे ।इन्ही नयनों से यह मंत्र अपने साध्य को बस में कर लेता था और आज भी कर रही हैं।
आश्चर्य यह है कि लड़कर भी ये आँखें हँसा हँसा कर फँसाती हैं -
नयन लड़ जइहें तो धमाका होइबे करी ।
आगे -
"अना अनी लोचन करै मन नाँहक फँस जाए ।"
अच्छा ! फँसे भी क्यों नहीं ,यह कंगाल तो है नहीं ,
अमिय हलाहल मद भरे सेत साम रतनार ।
जीयत मरत झुकि झुकि परत जेहि चितवत एक वार ॥
ऐसा कोई आयुध तो बना नहीं जिसमें जीवन देने,प्राण हरने और मस्ती ऊड़ेलने की एक साथ क्षमता हो ।नासा ने नहीं बनाया ,उसके वस की बात नहीं थी परंतु,नासा के ऊपर वाले का यह कमाल है ।जिसने पातंजल योग शास्त्र घोरकर पी लिया हो या फिर बाबा रामदेव के योगपीठ से निष्णात डिग्री लेकर पेट फुलाने की कला के प्रयोग में प्रवीण हो, वही इस मारक आयुध का सामना कर गोरस (मधुरस)पान करने में सक्षम हो सकता है ।क्योंकि ऐसे योगियों को अमीय भरे इन आँखों का ही सहारा है ,ढोंगियों की मृत्यु अवश्यमभावी है इन हलाहल भरे नयनों के वाण से और जिसने बच्चन की मधुशाला का अनवरत पाठ किया है ,उनके क्या कहने हैं ! वे मदभरे नयनों से चूने वाले स्राव को सहन नहीं करते तो झुकि झूकि परत का अनुसरण कर संसार के आनन्द खजाने की संबृद्धि करते हैं । त्वरित मारक आयुधों में भले ही आज बोफोर्स और रफाल बनाकर वैज्ञानिक अपनी पीठ अपनी ही चप्पल से थपथपा लें और बाजी मारने का स्वांग रचा लें ,परंतु वे इन सेत साम रतनार का समना करने मैं समर्थ नहीं हो सकते ।उन्होने अभी तक कोई ऐसा आयुध नहीं बनाया जिसमें अमृत ,विष एवं मधुरस भी हो ।
ये मूक हत्या(कोल्ड ब्लैक वार) करने में माहिर होती हैं -
करत घात पर घात अली यह नहीं कहुँ आबत जात ।
अपने स्थान से हिलती भी नहीं और प्रभावकारी संधान कर बैठती ।सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह अपने अरिदल में साधु, संयासी ,गृहस्त ,योगी भोगी ढोंगी कुछ नहीं समझती। सारंग नयनी मेनका के नयन -वाण से महामुनी विश्वामित्र बिंधे थे तब उनकी कोई विद्या ,कोई योग जप साधन साधना काम नहीं आई थी ।उसी समय वे पाठ करने लगे थे -
"मृग नयनी के नयन सर को अस लाग न जाहीं "।
महाराज शांतनु के धनुष - वाण रखे ही रह गए थे जब मत्स्यगंधा ने जादुभरे नयनों की प्रत्यंचा से आड़े -तिरछे वाणों की बौछार होने लगी थी । घायल नृपति ने भी शरसंधान नहीं किया होगा ,ऐसा संभव नहीं है ,परंतु क्या मजाल कि हिप हिप हुराऽऽऽ कर सकें । उनके वाणों की मार ही विचित्र होती है ।
इन जादुगरी आँखों का प्रयोग राजा - महाराजा ,साधु - सन्यासी,अभिनेता - राजनेता ,सेवक - स्वामी ,कायर - योद्धा ,शिकारी - खेलाड़ी, बच्चे - बूढ़े,पदाधिकारी - पर्दाधिकारी सभी अपने - अपने दाँव -पेंच से करते हैं ।किसी भी तरह की फाइल के निपटान में ये आँखैं बड़ा कमाल दिखाती हैं।
इन आँखों का प्रभाव क्षेत्र असीम है ।अनगिनत परिजन -पुरजन आत्मीय - परिचित जुटे हों,चतुर चितेरे पलक झपकते ही पलक मार कर पत्ता साफ कर देते हैं और छोड़ देते हैं सिर्फ प्रणय निवेदन ।विहारीलाल जी पीछे से देखते रह जाते हैं -
दृग उलझत टूटत कुटुम जुरत चतुर चित प्रीति ।
परत गाँठ दुरजन हिय दवी नई यह रीति ॥
वस ,उलझने की देरी है -परजन परिजन पुरजन सन्तजन सज्जन महाजन सबके बन्धन तड़ातड़ टूटने लगते हैं । इसे फिर जोड़ने के काम भी आँखें ही करती हैं ,परंतु -
जोड़े पर फिर ना जुड़ै जुड़ै गॉठ परि जाए - सिर्फ दुरजन के हिय माँहि।
परत गाँठ दुरजन हिय ।
कभी - कभी दो धाराओं के बीच पड़कर ये आॉखें भँवर बन जाती हैं , नाचती है ,नचाती है और स्वयं लाल पीली होने लगती हैं ।
भीड़ भाड़ , सभा- सोसाएटी ,मेले -ठेले , वाग - बगीचे में भी ये घात -प्रतिघात करने से नहीं चुकतीं।मार्जार रति निवेदन में प्रवीण नायिका इन कलाओं में माहिर होती हैं -
कहत नटत रीझत खीझत मिलत खिलत लजियात ।
भरे भौन में करत हैं नयनुनिहि सो बात ॥
इन कलाओं के आगे आज के तरुणों का फेसबुक चैट या इस्टाग्राम चैट सब फेल है ।यह दृश्य -
कहत - नटत - रीझत तक तो समझ में आता है ,परंतु रीझत के बाद यह खीझत कौन सी वला आ गई ,और फिर लजियात ?खीझने के बाद लजियात कहने का अर्थ नायिका विशैष की विशिष्ट विशेषता है । फिर नयन का बात करना !मैं यह रहस्य समझने में अपने को सक्षम नहीं पा रहा हूँ ,परंतु कोई धुरंधर अनुसंधान कर्ता होता तो यह स्पष्ट कर देता कि विहारी लाल जी पहले हुए थे या गोस्वामी बाबा ? क्योंकि तुलसी बाबा के समय में आॉखे बोलती नहीं थीं और उन्हें इसका मलाल था ।उन्होने तड़प -तड़प कर घोषणा की है -
स्याम गौर किमि कहौं बखानी ।
गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥
विहारी की आँखें भरे भौन में बात करती हैं ,वहीं जगत जननी मिथिलेश नन्दिनी की आँखें दरबाजा खोल देती हैं -
लोचन मग रामहि उर आनी ।
दीन्हें पलक कपाट सयानी ॥
उद्धव बाबा की ज्ञान गुदरी वहीं फट गई थी जब गोपियों ने कहा -
" जिस आँख में एक तिनका पड़ जाता है तो पीर घनेरी होती है और जिस आँख में श्याम घुस गए हैं उसका क्या हो सकता है,उद्धव जी आप समझिए।"
उद्धव जी कहाँ चुकनेवाले थे , उन्होने तुरत कहा , किशोरी जी ( मिथिलेश नन्दिनी ) ने इतने बड़े त्रिलोकी नाथ को आँख मे घुसाकर पलक कपाट दिन्ह सयानी कर लिया और मुस्कुराते हुए सहज सुन्दर साँवरो को चुपके- चुपके निहारते मिथिलापति सदन में आशा का दीप जलाकर बैठ गई थी और आपलोग निकालने का प्रयास भी नहीं करतीं और दर्द भी नहीं सहना चाहतीं।
गोपियों ने बाजी मार ली , कहा - राम जी कम बुद्धिमान थे ।अना अनी दोनो ने किया ,लेकिन राम जी ने डायरी निकाली ,कलम खोली और लिखने लग गए -
परम प्रेममय मृदु मसि किन्ही।
चारु चित्त भित्ती लिख लिन्ही ॥
और हमरे कन्हैया ! हमरे कन्हैया तो बड़े चतुर हैं उद्धव बाबा ,घुस गए तो निकलते ही नहीं ।
"निकासै निकसै नहीं उद्धव तिरछी होय जू अड़ै।"
सूरदास जी जन्मांध थे या आँखें बाद में फोड़ ली थी अथवा फोड़ दी गईं थीं ,शोध का विषय है ,इस लफड़े में मैं नहीं पड़ना चाहता ,परंतु इतना सही है कि जो इस रहस्य पर से जो परदा हटा देगा वह अशोक चक्र का हकदार हो जाएगा ।लेकिन दर्शन !
बिना वस्त्र शृंगार के कन्हैया का दर्शन कर वर्णन किया -
देख्यो री हरि ! नंगम नंगा ।
जलसुत भूषण अंग विराजति बसनहीन छवि उठत तरंगा ।
अंग अंग प्रतिअमित माधुरी निरखि लज्जित रति कोटि अनंगा ।
सूरबाबा ने उसी आँख से कृष्ण की यह छवि देखी और उसी आँख से भगवान शंकर ने झखकेतु पुष्पधन्वा कामदेव को जलाकर अतनु की संज्ञा दे दी ।
सूर बाबा की आँखें सिर्फ श्याम को देखती हैं -
सुरदास श्याम बिनु देखे और केहु नहीं सूझै ।
आँखों को कभी भूख लगती है कभी प्यास लगती है ,परंतु है ये सब प्रणय निवेदन के वहाने हैं।
आँखिया हरि दर्शन की प्यासी !
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आँखिया हरि दर्शन की भूखी !
रहीम एकल प्रेयसी ब्रत का पालन कर रहे थे ।बस ! एक प्रेमिका -
जिन नैनन प्रीतम बस्यों,तँह किमि और समाय ।
भरी सराय रहीम लखी पथिक आपु फिरी जाय ॥
आॉखों का रंग भी काम कर जाता है ।आँखें लाल होकर ,पीली होकर इष्टमैनकलरफुल टेलिविजन बन जाती हैं ।जनक जी के दरवार मैं आवेशावतार परशुराम जी आँखें ही तो कमाल कर गईं थीं-
अरून नयन अरु वाहु विसाला ।
भृकुटि कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितबत मनहुँ रिसाते ॥
नयनों का वाण पुमंगता के साथ चला कि -
पितु समेत लेइ लेइ निज नामा ।लगे करन सब दंड प्रनामा ॥
यह अकाट्य सत्य है कि योगी यति की तपस्या कोई काम नहीं आती इन आँखों के सामने ,हाँ ! आँख के वल त्रिलोक पर विजय पाकर अघोषित स्वामी बना जा सकता है -
साम पूतरी सेत हर अरुण ब्रह्म चख लाल।
तीनो देवन बस करै क्यों मन रहे जमाल ।
कभी आँखें बरसती हैं तो पनारा बहने लगता है -
निसिदिन बरसत नयन हमारे ।
कंचुकि कबहुँ सूखत नहिं सजनी उर बीच बहत पनारे ।
आँखें उसकी भी बरसती हैं जिसका प्राणेश्वर अथाह सागर के उत्ताल तरंगों की छाती चिरती हुई नृत्त्यावती नाविका के साथ अदृश्य में खो जाता है और वह नायिका आँख गड़ाकर छितिज के पार निहारने का प्रयास करती है -
अधराइयाँ झाँई पड़ी पंथ निहार निहार ।
ये आँखें यमराज से भी निवेदन कर बैठती हैं ।प्रिय का दर्शन उसका अभीष्ट है -
कागा सब तन खाइयो चुनि चुनि खाइयो मास ।
दुइ अँखिया मत खाइयो पिया मिलन की आस ॥
यह मृगनयनी अपनी आँखों से सब बात सुना जाती है ,परंतु सारंग नयनी मृगा की बात कुछ और होती है -
मृग नयनी की बात सुनी ,सुन मैग के नयनों की बात॥ सुन अब इन आँखों की बात ॥
लेखक डॉ सच्चिदानन्द प्रेमी, राष्ट्रीय शिक्षा पुरष्कार ,निराला साहित्य सम्मान ,राधाकृष्णन शिक्षा सम्मान प्राप्त कृतकार्य प्राचार्य राष्ट्रीय अध्यक्ष ,अखिल भारतीय मगही प्रचारनी सभा है |
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