यूजीसी कानून के विरोध में आयोजित सभा : शिक्षा, सामाजिक संतुलन एवं अधिकारों की रक्षा का संकल्प

- यूजीसी ने अंग्रेजों के बनाए दमनात्मक क्रूर कानून को भी मात दे दिया:- भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा
आज देश की शिक्षा व्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। इसी संदर्भ में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) कानून के विरोध में गया स्थित भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ० विवेकानंद मिश्र जी के आवास पर एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में समाज के अनेक गणमान्य नागरिकों, शिक्षाविदों एवं प्रबुद्ध वर्ग के लोगों ने भाग लेकर इस कानून की कठोर आलोचना की तथा इसके दूरगामी दुष्परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
सभा का शुभारंभ करते हुए डॉ० विवेकानंद मिश्र जी ने कहा कि यह कानून न केवल शिक्षा की स्वायत्तता पर आघात करता है, बल्कि समाज के एक वर्ग विशेष, विशेषकर स्वर्ण वर्ग, के अधिकारों एवं अवसरों को भी सीमित करने वाला सिद्ध हो सकता है। उन्होंने कहा कि यह कानून समान अवसर और सामाजिक संतुलन की भावना को कमजोर करता है। यदि शिक्षा नीति में संतुलन नहीं रहा, तो इससे समाज में असंतोष, मानसिक कुंठा एवं वैचारिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जो राष्ट्रहित के लिए घातक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूजीसी का मुख्य कार्य शिक्षा में ऐसा वातावरण तैयार करना था, जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी अपने को सहज समझे किंतु दुर्भाग्य है की इसने ने अपने कर्तव्य एवं दायित्व से विमुख होकर अंग्रेजों के दमनात्मक क्रूर कानून को भी मात दे दिया। क्योंकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय, संपूर्ण समाज की प्रगति में बाधा बनता है।
इसके पश्चात् आचार्य राधामोहन मिश्र ‘माधव’ जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था सदैव समानता, योग्यता और परिश्रम के सिद्धांतों पर आधारित रही है। किंतु वर्तमान यूजीसी कानून इन मूलभूत सिद्धांतों को कमजोर करता प्रतीत होता है।
भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के प्रदेश सचिव प्रोफेसर सुनील कुमार मिश्रा ने घोर चिंता व्यक्त करते हुए कहा की कि इस कानून के कारण स्वर्ण वर्ग सहित अनेक सामान्य वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों को आगे बढ़ने के समुचित अवसर नहीं मिल पाएंगे। इससे न केवल शैक्षणिक स्तर में गिरावट आएगी, बल्कि समाज में भयंकर भेदभाव असंतुलन भी उत्पन्न होगा। उन्होंने इस कानून को पुनः विचार हेतु सरकार इसकी गंभीरता को समझते हुए शीघ्र प्राथमिकता के आधार पर हस्तक्षेप कर स्वर्ण वर्ग को न्याय दिलाने की कृपा करे।
अंत में महासभा एवं मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आचार्य सच्चिदानंद मिश्र जी ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यदि शिक्षा नीति किसी वर्ग विशेष को मानसिक, सामाजिक या शैक्षणिक रूप से हतोत्साहित करती है, तो उसका दुष्प्रभाव पूरे राष्ट्र पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि स्वर्ण वर्ग सहित सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर, सम्मान और न्याय मिलना चाहिए। किसी भी नीति का निर्माण करते समय सामाजिक समरसता, संतुलन और राष्ट्रीय एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सभा के अंत में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि यूजीसी कानून पर पुनर्विचार किया जाए तथा शिक्षा नीति ऐसी बनाई जाए, जिससे सभी वर्गों के छात्रों को समान अवसर प्राप्त हों और समाज में समरसता बनी रहे।
इस प्रकार यह सभा केवल विरोध का मंच न होकर, न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक संतुलन एवं राष्ट्रहित की रक्षा का सशक्त संदेश बनकर उभरी।
जिन व्यक्तियों ने अपने विचार प्रकट किये उनमें पंडित मुरारी मिश्रा आचार्य सुनील कुमार पाठक आचार्य अभय कुमार पाठक अजय मिश्रा बबलू सूरज कुमार मिश्रा उपेंद्र मिश्रा पंडित शिवनंदन मिश्रा डॉक्टर जितेंद्र कुमार मिश्रा डॉक्टर पी पी मिश्रा अमरनाथ पांडेय जितेंद्र मिश्रा रंजीत पाठक पंडित महेश मिश्रा दिव्यांशु मिश्रा डॉक्टर विनोद मिश्रा डॉ विनय कुमार मिश्रा सुजीत कुमार सिंह दिलीप कुमार शंभू गिरी सुरेंद्र उपाध्याय शिवजी कुमार अजीत कुमार सिंह अधिवक्ता दीपक पाठक अधिवक्ता उत्तम पाठक अधिवक्ता मुन्ना बाबू अधिवक्ता आनंद कुमार सिंह अधिवक्ता एसके पाठक अधिवक्ता रविंद्र पाठक सभी ने गंभीर चिंता व्यक्त की तथा विचार करने की मांग की।
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