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मूर्ख को मूर्ख न कहो

मूर्ख को मूर्ख न कहो

कमलेश पुण्यार्क
सात हाथ के बाँस की फटही लाठी में लाल झंडा लटकाए, लाल-लाल आँखों से अंगारे उगलते सोढ़नदासजी अपनी गली से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर आकर, जोर-जोर से आम जनता का आहवान करने लगे— “ आ जाओ मेरे मूरख-महामूरख साथियों ! एक जुट होकर खड़े हो जाओ हमारे साथ। हम सब मिलकर सीधे राजभवन चलेंगे और फिर बड़े वाले राजभवन पहुँचने का भी जुगाड़ बैठायेंगे किसी तरह। हमारा एक सूत्रीय अभियान है—मूर्खों को विशेष दर्जा दिलवाना। हो सके तो दलित के बाद महादलित वाले स्टाइल में मूर्ख के बाद महामूर्ख पद को भी संवैधानिक मान्यता दिलवाना और इसी कड़ी में लगे हाथ ये भी अनुच्छेद जुड़वा देना विशेष आध्यादेश लगाकर कि मूर्ख को मूर्ख कहने पर बिना विचार, किसी लाग-लपेट, तर्क-वितर्क, जिरह-बहस के सीधे मृत्युदण्ड सिर्फ सुना ही नहीं देना, बल्कि कोर्ट के कठघरे के बगल में ही, न्यायाधीश के सामने ही सीधे फाँसी पर लटका देने का प्रावधान होना चाहिए, ताकि मौका पाकर हाज़त से अपराधी कहीं फरार न हो जाए या सोच-विचार कर कोई महंगा वाला ईमानदार, राष्ट्रभक्त वकील न रख ले नये अपील के लिए । त्वरित न्याय की ये अभूतपूर्व व्यवस्था जबतक लागू नहीं होगी, तब तक सुर्खियों में बने रहने के ख्याल से, नये वाले जिद्दी शंकराचार्य की तरह हम लोग भी आमरण अनशन पर बैठेंगे...। ”
सोढ़नदासजी की बातों में मुझे भी दम लग रहा है। अरे भाई! काना को काना, लंगड़े को लंगड़ा कहते हो क्या? और यदि कहते भी हो तो गलती करते हो । अगले जनम में भगवान तुम्हें भी वैसा ही बना देंगे। इसी पवित्र विचारधारा वाले हमारे प्रधानसेवक जी ने ‘दिव्यांग’ शब्द को खोज-ढूँढ़ कर निकाला शास्त्रों से और दिव्य शब्द की नयी वाली संवैधानिक परिभाषा रचकर, नया परिचय गढ़ दिया समाज के कुछ लोगों के कल्याण के लिए।
लेकिन मूर्ख यानी बुद्धि विहीन को दिव्यांग कहना भी शोभा नहीं देता। मौलिक दिव्यांग शब्द का पहले से ही अपमान हो चुका है। अतः मूर्खों के लिए दिव्यांग शब्द का प्रयोग कतई बरदास्त नहीं किया जा सकता। हाँ एक बात से बात बन सकती है—बेलन, चिमटा, चप्पल के भय से काली-कलूटी चुड़ैल सी बीबी को भी उर्वशी-मेनका कह कर विस्तर पर बुलाया जा सकता है, उसी अन्दाज में मूर्खों को भी महाज्ञानी...बुद्धिविशारद...महामहिम आदि शब्दों से अलंकृत-सुशोभित करना चाहिए।
वैसे भी हमारे सेक्यूलर संविधान ने, सबका साथ सबका विकास सबका विश्वास वाले संविधान ने पंडित को पंडितवा कहने में किसी तरह की आपत्ति नहीं जतायी है। मनुस्मृति फाड़ने-जलाने में कोई आपत्ति नहीं है शासन-प्रशासन को। वेद-पुराण-उपनिषद, गीता, गायत्री, राम, कृष्ण, देवी, दुर्गा किसी पर भी कुछ भी अभद्र टिप्पणी की खुली छूट है। छुट्टे सांढ़ घूम रहे हैं, लललहाती खेती में मुँह मारने को, किन्तु ‘कपार पर मूतने’ पर भी चमार को चमार नहीं कह सकते ।
मात्र एक दशक के करार पर, विगत सात दशकों से आरक्षण की जहरीली पुड़िया गटकने को मजबूर हैं। SC/ST/OBC आदि को संरक्षित करने वाले तरह-तरह के पुराने कानूनों से सन्तोष नहीं हुआ, हरिजनथाना बनाने से भी सन्तोष नहीं हुआ, तरह-तरह के झूठे मामले लादने से भी जी न भरा, अच्छे-भले कानूनों के धुँआँधार दुरुपयोग से भी मन न भरा, तो अब नया जहर थमाने की तैयारी हो रही है या कहें हो चुकी है।
UGC का सगूफा छोड़कर हमें आपस में लड़ने-कटने-मरने-मारने पर उतारु किया जा रहा है।
ओ मेरे प्यारे भाई ! जरा होश में आओ। नेताओं को अपने वोट की रोटी सेंकने दो। ये तो आने-जाने वाले लोग हैं— ‘कोई नृप होहूँ, हमें क्या हानि’ के शब्दों को थोड़ा बदल दो...कोई नेता होगा तुम्हारा कल्याण नहीं होने वाला है, जब तक तुम अपने कल्याण के लिए तत्पर नहीं होओगे। नेताओं की चिकनी-चुपड़ी बातों में फँसना क्या है—अंकुश में चारा लटकाए वंशी में फँसने जैसा है। सात पुस्त तक की अपनी व्यवस्था करने के बाद ही समय बचा तो तुम्हारी भलाई की बात सोचेगा नेता। क्योंकि नेता बना ही इसीलिए है। जनहित, राष्ट्रहित, जनसेवा, राष्ट्रसेवा के लिए नेता बनने वाले के कलेजे में अलग किस्म के बाल होते हैं और ऐसे बाल बहुत कम ही उगते हैं यूरिया-फॉस्फेट-थायमेट वाली मिट्टी में।
जरा गौर करो मेरे भाई ! सामाजिक समरसता और व्यवस्था के लिए समानान्तर रूप से चार वर्णों की बात कही गयी थी शास्त्रों में। किन्तु नासमझों ने, मूर्खों ने, कुटिलों ने, धूर्तों ने चार को चौआलिस हजार बना दिया जातिवाद का जहर घोलकर, मनुवाद का जाम पिलाकर। क्षितिज पर पसरी समानान्तर रेखा को खींच-तीर कर खड़ा कर दिया—अब वो ऊँच-नीच वर्ग-विभेदों में विखण्डित हो गया।
हरिजन से लेकर महादलित तक के शब्द विगत सदी के कुटिलों-जाहिलों की गंदी खोपड़ी के इजाद हैं। जरा सोचो—होटल-रेस्टोरेन्ट, ट्रेन, बस, आते-जाते, खाते-पीते, सोते-जागते, यहाँ तक कि अब शादी-सम्बन्ध रचाने तक भी निर्विवेक होकर, सिर्फ चमड़ी और दमड़ी देख कर काम कर गुजारते हो। और दूसरी ओर वोट देते समय जाति-विरादरी का विचार करते हो !
अब से कोई साठ साल पहले एक दूरदर्शी नेता ने अपने खास लोगों से खुलेआम सभा में कहा था—चिन्ता न करो...भविष्य तुम्हारे ही हक में है...रात को दरवाजे खुले रखो, ताकि तुम्हारे नस्लों में सुधार हो...।
वह सुधरा हुआ नहीं, बिगड़ा हुआ नस्ल ही हमारे सामने है आज। हमारी नासमझी का ही परिणाम है वर्तमान । हम दो किलो चावल और मुफ्त की विजली-पानी पर विके हुए लोग हैं। नोटों की गड्ड़ी और शराब की बोतलों पर बिके हुए लोग हैं।
वैसे भी लोकतन्त्र सिर्फ कहने भर को है। किसी जानकार ने इसे मूर्खतन्त्र यूँ ही नहीं कहा था। जमात यदि मूर्ख है, नासमझ है तो उसके द्वारा सृजित तन्त्र भी तो वैसा ही होगा न। किन्तु विडम्बना ये है कि मूर्ख को मूर्ख कहना महान अपराध की श्रेणी में है। यही कारण है कि हमारे सोढ़नदासजी को आज झंड़ा उठाकर सड़क पर उतरना पड़ रहा है। यदि उनकी बातें लाभदायक लग रही हों तो अवश्य ही उनके खेमें में आ जाएँ, अन्यथा ये धूर्त नेता तुम्हें कहीं का नहीं रहने देंगे।
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