"अनुबंध: शून्यता और सूत्र"
पंकज शर्मामैं एक संभावना हूँ—काग़ज़ की,
जो नीले विस्तार की थाह लेने को आतुर है;
तुम वह मौन आधार हो,
जिसके होने मात्र से
मेरी उच्छृंखलता को एक अर्थ मिलता है।
डोर महज़ बंधन नहीं,
वह एक सूक्ष्म नाभि-नाल है—
जो मुझे जोड़ती है धरती की गुरुता से,
ताकि मैं आकाश की निस्तब्धता में
स्वयं को खो न दूँ।
विश्वास की वह ढील—
जो शिथिलता नहीं, एक गरिमामय छूट है,
वही मुझे सामर्थ्य देती है
ऊँचाइयों के उस हिंसक एकांत को
सहजता से जीने की।
यदि तुम विमुख हुए—
यदि वह सूत्र टूटा जो अदृश्य है पर अनिवार्य है,
तो मैं मात्र एक मयूरपंखी चिंदी हूँ,
जो अनिश्चित झोंकों की दया पर
किसी कंटीली झाड़ी में अपनी अस्मिता विसर्जित कर देगी।
मेरा आकाश की ओर बढ़ना
तुमसे दूर जाना नहीं,
बल्कि तुम्हारे अटूट धैर्य का विस्तार है;
मैं जितनी ऊँची जाऊँगी,
तुम्हारी उँगलियों पर मेरा खिंचाव उतना ही गहरा होगा।
हम दोनों के बीच तना यह सूत ही—
सृजन का वह शाश्वत सेतु है,
जहाँ मेरा उड़ना और तुम्हारा थामना
एक ही प्रार्थना के दो अलग स्वर बन जाते हैं;
मंजिल आसमान नहीं, वह 'जुड़ाव' है।
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✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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