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पौराणिक विरासत से आधुनिक जातिगत ‘चक्रव्यूह’ तक

पौराणिक विरासत से आधुनिक जातिगत ‘चक्रव्यूह’ तक

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भूमिका: संस्कृतियों का संघर्ष और सत्ता का खेल भारतीय इतिहास के पन्नों को यदि हम पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पलटें, तो संघर्ष का एक निरंतर क्रम दिखाई देता है। देव, मानव, गंधर्व, अप्सरा, नाग, मरुत और ऋक्ष संस्कृतियाँ उस समाज का हिस्सा थीं जो मर्यादा, सृजन और ज्ञान-आधारित व्यवस्था को सर्वोपरि मानती थीं। इसके समानांतर दैत्य, दानव और असुर संस्कृतियाँ प्रायः भौतिक विस्तार, अराजकता और वर्चस्व के संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती थीं। यह संघर्ष केवल हथियारों का नहीं, बल्कि ‘विचारधारा’ का था। वर्तमान भारत में, उसी प्राचीन संघर्ष ने एक नया रूप ले लिया है। आज का ‘देव-असुर संग्राम’ युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि संसद, विधानसभाओं और भर्ती बोर्डों में लड़ा जा रहा है, जहाँ ‘सवर्ण’ समाज को एक कृत्रिम शत्रु (Villain) के रूप में प्रस्तुत कर उसे कानूनी और राजनीतिक शिकंजों में कसा जा रहा है।: नारों की राजनीति और ‘भुराबाल’ का नैरेटिव में 90 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में भाषाई मर्यादा का पतन हुआ और विभाजकारी नारों का उदय हुआ। 'भुराबाल' (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) जैसे अपमानजनक शब्द और 'तिलक, तराजू और तलवार' को निशाना बनाने वाले नारे इसी दूषित मानसिकता की उपज हैं। नब्बे बनाम दस का तर्क: यह तर्क देकर कि "नब्बे पर दस का शासन नहीं चलेगा", योग्य और मेधावी सवर्ण समाज को एक 'शोषक' के रूप में पेश किया गया। राजनेताओं ने सवर्णों को एक ऐसे 'शिकंजे' में कसने की योजना बनाई है जिससे वे कभी उबर न सकें।
वोट बैंक की बलि: नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए धर्मवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद को इतना बुलंद कर दिया है कि आज़ादी के दीवानों का बलिदान ओझल होता दिख रहा है। स्वतंत्रता के समय जो व्यवस्था सामाजिक न्याय के लिए बनी थी, वह आज सवर्णों के लिए दमन का यंत्र बनती जा रही है: SC/ST एक्ट का भय: 1989 में पारित अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) निसंदेह दलितों की सुरक्षा के लिए था, किंतु आज इसकी धारा 18A और बिना जांच के तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधानों ने इसे एक 'कानूनी शस्त्र' में बदल दिया है। सवर्ण समाज का मानना है कि इस कानून का उपयोग अक्सर झूठे मुकदमों और व्यक्तिगत रंजिशों के लिए किया जा रहा है।
आरक्षण का अंतहीन मकड़जाल: विधानसभा, लोकसभा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का बढ़ता दायरा सवर्ण मेधा के लिए 'फांसी के फंदे' जैसा हो गया है। यूजीसी (UGC) और शिक्षा जगत: शिक्षा संस्थानों में जहाँ केवल प्रतिभा की पूजा होनी चाहिए थी, वहाँ 'रोस्टर सिस्टम' ने सवर्ण शोधकर्ताओं और प्रोफेसरों के करियर को अवरुद्ध कर दिया है। जब प्रतिभा को अवसर नहीं मिलते, तो राष्ट्र 'प्रतिभा पलायन' (Brain Drain) का शिकार होता है। वीर सावरकर और शहीदों के सपनों का भारत - क्या भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बिस्मिल और लाला लाजपत राय ने ऐसे भारत के लिए अपनी गर्दनें फांसी पर चढ़ाई थीं? सावरकर की 'सप्त बेड़ियाँ': सावरकर ने 'जातिमुक्त हिंदू संगठन' की बात की थी। उन्होंने वेदोक्तबंदी, स्पर्शबंदी और रोटीबंदी जैसी सात बेड़ियों को तोड़ने का आह्वान किया था। उनका स्पष्ट मानना था कि जातिवाद हिंदू समाज का कैंसर है। लेकिन आज के नेता इस कैंसर को पाल रहे हैं ताकि उनकी सत्ता की रोटी सिकती रहे।
शिवाजी और राणा प्रताप का आदर्श: शिवाजी महाराज की सेना में हर जाति का व्यक्ति 'हिंदवी स्वराज्य' के लिए लड़ रहा था। राणा प्रताप ने अरावली की कंदराओं में भीलों के साथ बैठकर रोटी खाई थी। इन महापुरुषों का लक्ष्य 'विदेशी आक्रांता' थे, न कि स्वदेश का अपना ही है। रक्षक ही आज भक्षक हो गए है।इतिहास गवाह है कि जब विदेशी आक्रांताओं ने भारत की अस्मिता पर प्रहार किया, तो सवर्ण समाज ने ही अग्रणी होकर मोर्चा संभाला है। पृथ्वीराज चौहान से लेकर राजा राममोहन राय तक, बंकिमचंद्र चटर्जी के 'वंदे मातरम' से लेकर विवेकानंद के 'शिकागो भाषण' तक—भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक पुनर्जागरण की मशाल इसी समाज के नायकों ने जलाई। आज उसी समाज को 'विदेशी' या 'बाहरी' कहना ऐतिहासिक तथ्यों के साथ क्रूरता है। राजा राममोहन राय, तिलक और दयानंद सरस्वती जैसे सवर्ण नायकों ने ही समाज सुधार की नींव रखी थी। उन्हें 'शोषक' घोषित करना ऐतिहासिक पाप है। पिछले कुछ वर्षों में पारित किए गए कानून और संशोधन इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि 'वोट बैंक' की राजनीति ने सवर्णों के हितों को संकुचित किया है: एससी/एसटी संशोधन अधिनियम, 2018: में जब सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिशा-निर्देश दिए, तो सरकार ने संसद में कानून बदलकर धारा 18A जोड़ दी। इस संशोधन ने सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षात्मक आदेश को शून्य कर दिया। नौकरियों में प्रवेश के बाद भी पदोन्नति में आरक्षण ने प्रशासनिक कार्यक्षमता को प्रभावित किया है। सवर्ण अधिकारियों के मन में यह कुंठा घर कर गई है कि उनकी वरिष्ठता और योग्यता का कोई मूल्य नहीं है। कई राज्य सरकारों ने कानून बनाकर आरक्षण को 70% से 80% तक पहुँचाने की कोशिश की है, जिससे सवर्णों के लिए 'अनारक्षित' श्रेणी अब नाममात्र की रह गया है।
यदि भारत को सचमुच एक आधुनिक राष्ट्र बनना है, तो उसे 'शिकंजों की राजनीति' से बाहर निकलना होगा।राष्ट्र का भविष्य 'आरक्षण' से नहीं, बल्कि 'इनोवेशन' और 'क्वालिटी' से तय होगा। किसी भी कानून का आधार व्यक्ति की 'जाति' नहीं, बल्कि 'कृत्य' होना चाहिए। SC/ST एक्ट में गिरफ्तारी से पूर्व जांच अनिवार्य होनी चाहिए।: शिवाजी और सावरकर के आदर्शों पर चलते हुए जातिगत नफरत को त्यागकर 'राष्ट्र-प्रथम' की भावना जागृत करनी होगी ।भारत का भविष्य 'जातिवाद के नंगे नाच' में नहीं, बल्कि 'समरसता के महायज्ञ' में है। सवर्ण समाज पर अनेक धाराओं और आरक्षणों का शिकंजा कसना वास्तव में राष्ट्र के बौद्धिक और सामरिक सामर्थ्य को कमजोर करना है। सावरकर की 'सप्त बेड़ियाँ' आज नए रूप में—आरक्षण की बेड़ी, कानूनी मुकदमों की बेड़ी और राजनीतिक घृणा की बेड़ी—के रूप में सवर्ण समाज को जकड़ रही हैं। यदि शिवाजी की वीरता, सावरकर का राष्ट्रवाद और शहीदों का बलिदान हमारी प्रेरणा है, तो हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना होगा जहाँ जाति गौण हो और 'भारतीयता' सर्वोपरि। नेताओं को यह समझना होगा कि सवर्णों का विरोध करके वे केवल एक वर्ग को नहीं, बल्कि उस 'मेधा' को दंडित कर रहे हैं जो भारत को दुनिया के मंच पर गौरव दिलाती है। अब समय आ गया है कि समाज इन संकुचित जंजीरों को तोड़कर बाहर आए ।
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