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बेटा डाँट रहा बाबा को

बेटा डाँट रहा बाबा को, बाबा चुप- चुप सहते हैं,

कुछ घर की मर्यादा, कुछ जग समाज से डरते हैं।
हिम्मत उनमें बहुत घनी, उसको धूल चटाने की,
उसकी माँ के तानों से, बाबा आशंकित रहते है।


बिगड़ गये बेटे को अक्सर, फटकार लगानी पड़ती है,
नहीं मानता बड़ों का कहना, दुत्कार लगानी पड़ती है।
कभी कभी तो बेदख़ली का, कठोर निर्णय लेना पड़ता,
बात बने ना जब बात से, हवालात दिखानी पड़ती है।


नये दौर में हमने तो, अब बदलना सीख लिया,
क़ानून के प्रावधान, कुछ पढ़ना भी सीख लिया।
कुछ धन सम्पत्ति बाँटी, कुछ पर रखा हक़ अपना,
स्वार्थ भरी दुनिया में, हमने भी जीना सीख लिया।


क्यों रहें निर्भर किसी पर, जब तक तन में जान है,
सकारात्मक सहयोग करें, जब तक तन में प्राण है।
नया दौर एकल परिवार, मिल जुल रहने की चाह,
हाथ बटायें परिवार में, सबका मान सम्मान है।


‘मैं’ का अहम् त्यागना होगा, उम्र के इस दौर में,
संयमित जीवनशैली हो निज, उम्र के इस दौर में।
बच्चों की सुख सुविधाओं का, ध्यान हमें ही रखना,
संयुक्त परिवार बचे कहाँ अब, उम्र के इस दौर मे।


संस्कारों का पाठ पढाना, अपनी ज़िम्मेदारी है,
संस्कृति का सार बताना, अपनी ज़िम्मेदारी है।
धर्म कर्म ज्ञान अध्यात्म, शस्त्र शास्त्र की शिक्षा,
रिश्तों का भी मर्म बताना, अपनी ज़िम्मेदारी है।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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